कल होगा स्वर्णिम विजय मशाल का लखनऊ में आगमन

लखनऊ। दिसंबर 1971 में भारतीय सशस्त्र बलों ने सैन्य इतिहास में शानदार जीत हासिल की। 03 दिसंबर 1971 को शुरू हुए 1971 के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सैनिकों की बहादुरी के परिणामस्वरूप एक नए राष्ट्र-बांग्लादेश का निर्माण हुआ।

इस ऐतिहासिक जीत के पचास वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश स्वर्णिम विजय वर्ष मना रहा है। चार विजय मशालों में से एक विजय मशाल 08 दिसंबर से 12 दिसंबर 2021 तक लखनऊ में होगी। लखनऊ में सम्मानित की जाने वाली विजय मशाल वह मशाल है जो पूर्वी कार्डिनल दिशा की ओर अग्रसर थी और बांग्लादेश सहित विभिन्न सैन्य स्थलों का दौरा करने के बाद राष्ट्रीय युद्ध स्मारक नई दिल्ली की ओर अपनी यात्रा के अंतिम चरण में है।

स्वर्णिम विजय मशाल के लखनऊ आगमन पर सूर्य कमान 08 से 12 दिसंबर 2021 तक कई कार्यक्रमों के साथ स्वर्णिम विजय वर्ष मना रही है। 09 दिसंबर की सुबह, विधानसभा में भव्य उत्सव के साथ मशाल को श्रद्धांजलि दी जा रही है। उसी शाम 05:30 बजे तक जनेश्वर मिश्र पार्क में विक्ट्री फ्लेम रखा जाएगा जहां लखनऊ वासी मशाल को श्रद्धांजलि दे सकेंगे। इस कार्यक्रम में एक सैन्य बैंड द्वारा बैंड डिस्प्ले के साथ-साथ भारतीय सशस्त्र बलों की ताकत को प्रदर्शित करने वाला हथियारों का प्रदर्शन भी होगा। इसके अलावा, वाले युवाओं के लिए, सेना में शामिल होने के बारे में जानकारी देने के लिए एक सूचना बूथ भी स्थापित किया जाएगा। विक्ट्री फ्लेम की मेजबानी बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय और लखनऊ विश्वविद्यालय द्वारा 10-11 दिसंबर को की जा रही है, इसके बाद यह विजय मशाल 12 दिसंबर 2021 को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, नई दिल्ली के लिए प्रस्थान करेगा।

स्वर्णिम विजय वर्ष समारोह का आरम्भ माननीय प्रधान मंत्री द्वारा चार विजय मशालों को प्रज्ज्वलित करके किया गया था । राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर शाश्वत ज्योति से 4 स्वर्णिम विजय मशाल, देश की चार प्रमुख दिशाओं भेजी गयी थीं। अपनी यात्रा के दौरान, विजय मशाल ने हमारे बहादुर सैनिकों के बलिदान की स्मृति का सम्मान करने के लिए विभिन्न युद्ध नायकों और युद्ध के मैदानों का दौरा किया और संबंधित क्षेत्रों से मिट्टी एकत्र की, जिसे अंततः 16 दिसंबर 2021 को आयोजित एक भव्य समारोह में राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में समाहित किया जाएगा।

भारतीय सशस्त्र बलों ने 1971 के युद्ध में पाकिस्तान के सशस्त्र बलों की युद्ध क्षमता का पूर्ण समर्पण सुनिश्चित किया। पाकिस्तानी सेना के लगभग 93,000 सैनिकों के आत्मसमर्पण किया, जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा सैन्य आत्मसमर्पण था। 16 दिसंबर 1971 को ढाका में लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाज़ी और लेफ्टिनेंट जनरल जेएस अरोड़ा के बीच आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस दिन को देश में विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है।

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