सुप्रीम कोर्ट ने संसद पर छोड़ दिया है कि उसके पुराने तथा नए दागी नेता चुनाव लड़ेंगे या नही, जानिये… 

सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को दो अहम मामलों में फैसला सुनाएगा। एक गंभीर अपराध में अदालत से आरोप तय होने पर चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। दूसरा सांसद और विधायकों के वकालत करने पर रोक लगाई जाए। 

पहले मामले पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ फैसला देगी जबकि दूसरे मामले पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ फैसला सुनाएगी। इन दोनों ही मुद्दों पर आने वाले फैसले राजनीति पर गहराई से असर डाल सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को दो अहम मामलों में फैसला सुनाएगा। एक गंभीर अपराध में अदालत से आरोप तय होने पर चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। दूसरा सांसद और विधायकों के वकालत करने पर रोक लगाई जाए।   पहले मामले पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ फैसला देगी जबकि दूसरे मामले पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ फैसला सुनाएगी। इन दोनों ही मुद्दों पर आने वाले फैसले राजनीति पर गहराई से असर डाल सकते हैं।  दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक यानी जिसके खिलाफ पांच साल से अधिक की सजा के अपराध में अदालत से आरोप तय हो जाएं उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट मे कई याचिकाएं लंबित हैं। जिसमें पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका शामिल है।   इस मामले में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, आरएम नारिमन, एएम खानविल्कर, डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बहस सुनकर गत 28 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए।   पांच साल से अधिक की सजा के अपराध में अदालत से आरोप तय होने का मतलब होता है कि अदालत ने उस व्यक्ति को प्रथमदृष्टया आरोपी माना है। चुनाव आयोग ने भी इस याचिका का कोर्ट में समर्थन किया था हालांकि केन्द्र सरकार ने याचिका का पुरजुर विरोध करते हुए दलील दी थी कि कानून में आरोप तय होने के बाद चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है और न ही इसे अयोग्यता में गिना गया है ऐसे में कोर्ट अपनी तरफ से कानून में अयोग्यता की शर्त नहीं जोड़ सकता।   हैकर की जद में आपका स्‍मार्ट फोन और PC! सोमवार व बुधवार को बरतें विशेष सावधानी यह भी पढ़ें दूसरा मामला सांसदों और विधायकों के वकालत करने पर रोक लगाने की मांग का है। भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय ने यह याचिका दाखिल की है। इस पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविल्कर और डीवाई चंद्रचूड़ ने गत 9 जुलाई को बहस सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।   याचिका में उपाध्याय का कहना है कि सांसद विधायक लोकसेवक होते हैं इन्हें सरकारी कोष से वेतन भत्ता गाड़ी बंगला और पेंशन लोक कार्य करने के लिए मिलती है। इन्हें यह सब निजी कार्य या वकालत के लिए नहीं मिलता। इनका काम पूर्णकालिक माना जाएगा क्योंकि सिर्फ पूर्णकालिक कार्य के लिए ही पेंशन का प्रावधान है अंश कालिक कार्य के लिए पेंशन नहीं मिलती।   इसके अलावा याचिकाकर्ता की यह भी दलील थी कि सांसदों के पास जजों को पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने की शक्ति होती है ऐसे में इनका वकालत करना हितों का टकराव है। केन्द्र सरकार ने इस याचिका का भी कोर्ट में विरोध किया है।  इस मामले में आने वाला फैसला कई वरिष्ठ नेताओं की वकालत पर असर डाल सकता है। लगभग सभी राजनैतिक दलों में वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ वकील शामिल हैं जिन पर फैसले का प्रभाव पड़ सकता है।

दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक यानी जिसके खिलाफ पांच साल से अधिक की सजा के अपराध में अदालत से आरोप तय हो जाएं उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट मे कई याचिकाएं लंबित हैं। जिसमें पब्लिक इंटरेस्ट फाउंडेशन, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त जेएम लिंगदोह और भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय की जनहित याचिका शामिल है। 

इस मामले में मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, आरएम नारिमन, एएम खानविल्कर, डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बहस सुनकर गत 28 अगस्त को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। याचिकाकर्ताओं की दलील है कि राजनीति का अपराधीकरण रोकने के लिए दागियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए। 

पांच साल से अधिक की सजा के अपराध में अदालत से आरोप तय होने का मतलब होता है कि अदालत ने उस व्यक्ति को प्रथमदृष्टया आरोपी माना है। चुनाव आयोग ने भी इस याचिका का कोर्ट में समर्थन किया था हालांकि केन्द्र सरकार ने याचिका का पुरजुर विरोध करते हुए दलील दी थी कि कानून में आरोप तय होने के बाद चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है और न ही इसे अयोग्यता में गिना गया है ऐसे में कोर्ट अपनी तरफ से कानून में अयोग्यता की शर्त नहीं जोड़ सकता।

दूसरा मामला सांसदों और विधायकों के वकालत करने पर रोक लगाने की मांग का है। भाजपा नेता अश्वनी कुमार उपाध्याय ने यह याचिका दाखिल की है। इस पर मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा, एएम खानविल्कर और डीवाई चंद्रचूड़ ने गत 9 जुलाई को बहस सुनकर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। 

याचिका में उपाध्याय का कहना है कि सांसद विधायक लोकसेवक होते हैं इन्हें सरकारी कोष से वेतन भत्ता गाड़ी बंगला और पेंशन लोक कार्य करने के लिए मिलती है। इन्हें यह सब निजी कार्य या वकालत के लिए नहीं मिलता। इनका काम पूर्णकालिक माना जाएगा क्योंकि सिर्फ पूर्णकालिक कार्य के लिए ही पेंशन का प्रावधान है अंश कालिक कार्य के लिए पेंशन नहीं मिलती। 

इसके अलावा याचिकाकर्ता की यह भी दलील थी कि सांसदों के पास जजों को पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने की शक्ति होती है ऐसे में इनका वकालत करना हितों का टकराव है। केन्द्र सरकार ने इस याचिका का भी कोर्ट में विरोध किया है।

इस मामले में आने वाला फैसला कई वरिष्ठ नेताओं की वकालत पर असर डाल सकता है। लगभग सभी राजनैतिक दलों में वरिष्ठ नेता और वरिष्ठ वकील शामिल हैं जिन पर फैसले का प्रभाव पड़ सकता है।

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