देहरादून जू में कैक्टस पार्क: साढ़े चार सौ प्रजातियां उगाई जाएंगी

मालसी डियर पार्क के नाम से मशहूर देहरादून जू नित नए आयाम छू रहा है। आज जू ने दून को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। आज न केवल स्थानीय, बल्कि बाहरी राज्यों से भी लोग देहरादून जू का दीदार करने बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं। ये कहना है वन एवं पर्यावरण मंत्री हरक सिंह रावत का। देहरादून जू में कैक्टस पार्क: साढ़े चार सौ प्रजातियां उगाई जाएंगी देहरादून जू में नवनिर्मित कैक्टस पार्क का वन एवं पर्यावरण मंत्री हरक सिंह रावत ने शुक्रवार को उद्घाटन किया। दून जू में बने इस कैक्टस पार्क में नागफनी की करीब साढ़े चार सौ विभिन्न प्रजातियां उगाई गई हैं। वन मंत्री ने कहा कि एक समय था जब इस पार्क की छवि आम लोगों के सामने ठीक नहीं थी। लोग परिवार के साथ यहां आने में हिचकते थे, लेकिन बीते चार-पांच सालों में इसका नाम और पहचान बदलने के साथ जू नित नए आयाम छू रहा है।

वन विभाग के अधिकारियों, कर्मचारियों की मेहनत का नतीजा ही है कि यह पहचान बदली है। कहा कि जिस प्रकार का कैक्टस पार्क जू में बनाया गया है, शायद ही देश के किसी अन्य जू में ऐसा होगा। इसके अतिरिक्त पार्क में बने एक्वैरियम, पशु-पक्षियों की वेरायटी आदि भी जू में हैं, जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं। उन्होंने वन विभाग खासकर पार्क निदेशक पीके पात्रो के प्रयासों की जमकर सराहना की। 

प्रमुख मुख्य वन संरक्षक जयराज ने भी पार्क के लिए हरसंभव मदद का भरोसा दिया। पार्क निदेशक पीके पात्रो ने कहा कि भविष्य में कैक्टस पार्क में नागफनी की और प्रजातियां लगाई जाएंगी। उन्होंने जू में भविष्य में संचालित होने वाली योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया। 

17 हजार 926 हजार प्रजातियों पर विलुप्ति का संकट 

विश्व की 52 हजार 17 वन्य प्रजातियों में से 17 हजार 926 प्रजातियां विलुप्ति की कगार पर खड़ी हैं। विशेष रूप से डोडो, स्टेलर सी काओ, क्वागा, तस्मानिया वुल्फ, डॉल्फिन, डुगोंग, मणिपुरी हिरन प्रमुख हैं। यह बात भारतीय वन्यजीव संस्थान के निदेशक डॉ. वीवी माथुर ने अंतरराष्ट्रीय जैवविविधता कांग्रेस में कही। 

उन्होंने संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण को मिटिगेशन स्ट्रेटेजी प्रस्तुत करते हुए इसके अनुपालन पर बल दिया। जैवविविधता कांग्रेस के दूसरे दिन यानी शुक्रवार को जैवविविधता के संरक्षण व उससे जुड़े विषयों पर 88 शोधपत्र प्रस्तुत किए गए। इसके अलावा विभिन्न सत्रों में हिमालयी पारिस्थितिकीय सेवाओं को शामिल करने और इसके उपयोग पर जोर दिया गया। 

वहीं, जैवविविधता पर नवधान्य की ओर से प्रकाशित दो पुस्तकों का विमोचन भी किया गया। इस अवसर पर अंतिम सत्र की अध्यक्षता करते हुए पर्यावरणविद् डॉ. वंदना शिवा ने जैवविविधता के लिए दूरदराज के क्षेत्रों में मानव, सामाजिक मूल्यों, सांस्कृतिक मूल्यों, भोजन पोषण व स्वास्थ्य की जैवविविधता की अवधारणा पर काम करने की जरूरत बताई। इसी सत्र में जर्मनी की कंज्यूमर प्रोटेक्शन एंड एग्रीकल्चर की पूर्व मंत्री रिनेत कुनास्थ ने जर्मनी समेत विभिन्न पश्चिमी देशों में मौद्रिक लाभ के लिए जैवविविधता की हानि पर चिंता व्यक्त की। 

उन्होंने जैवविविधता की रक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रोटोकॉल और समझौतों का कड़ाई से पालन कराए जाने की बात कही। ताकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भरता और उनके एकाधिकार को तोड़ा जा सके। इस अवसर पर यूकॉस्ट के महानिदेशक डॉ. राजेंद्र डोभाल, उत्तराखंड जैवविविधता बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. राकेश शाह, सदस्य सचिव एसएस रसाईली आदि उपस्थित रहे। 

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