भारत के लिए तो ‘शरीफ’ बने रहे नवाज, दबाव में सुधार नहीं पाए कभी रिश्ते!

जब पाकिस्तान में उथल-पुथल हो तो भला भारत कैसे खामोश रह सकता है. भारत की इस पूरे केस में दिलचस्पी हो सकती है क्योंकि नवाज शरीफ और भारत के बीच रिश्ते नरम-गरम रहे हैं.जब पाकिस्तान में उथल-पुथल हो तो भला भारत कैसे खामोश रह सकता है. भारत की इस पूरे केस में दिलचस्पी हो सकती है क्योंकि नवाज शरीफ और भारत के बीच रिश्ते नरम-गरम रहे हैं.  दरअसल चार साल पहले जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब नवाज शरीफ खास मेहमानों में शामिल थे. शपथ ग्रहण के करीब छह महीने बाद फिर वो लम्हा भी आया जब नवाज शरीफ की नातिन मेहरुन्निसा की सगाई में पाकिस्तान पहुंच गए. शरीफ की नातिन को आशीर्वाद दिया. उनकी पत्नी को शॉल भेंट की, इससे पहले जब शरीफ मोदी के शपथ ग्रहण में शरीक हुए थे तो उनकी पत्नी के लिए साड़ी लेकर आए थे.  पीएम नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ की साड़ी-शॉल कूटनीति से ऐसा लगा था कि आपसी गर्मजोशी का सकारात्मक असर भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर भी नजर आएगा लेकिन अफसोस ये गर्मजोशी यहीं तक रुक गई. शरीफ रिश्तों को सुधारने में बड़ा कुछ नहीं कर पाए.  बेशक पीएम मोदी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ाया था उसे थामने में शरीफ नाकाम रहे, लेकिन शरीफ को इस बात का श्रेय जाता है कि नब्बे के दशक में जब वो दूसरी बार पीएम बने थे तब उन्होंने भारत के साथ रिश्तों को बेहतर करने की कोशिश की थी. वो शरीफ का ही कार्यकाल था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ऐतिहासिक लाहौर पर पहुंचे थे.  इस दौरे में भारत और पाकिस्तान के बीच एक करार हुआ था जिसे लाहौर समझौता कहा जाता है. इस समझौते से ये उम्मीद बंधी थी कि भारत-पाकिस्तान के तल्ख रिश्तों का दौर बदलेगा. लेकिन रिश्तों में सुधार की जो उम्मीद बंधी थी ऐसा हो नहीं पाया और थोड़े दिनों बाद कारगिल युद्ध के रूप में भारत को बड़ा धोखा हाथ लगा.  बेशक, कारगिल युद्ध के वक्त नवाज शरीफ पाकिस्तान के पीएम थे, लेकिन माना जाता है कि ये जंग उनके दिमाग की उपज नहीं थी. बाद में पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कहा था कि नवाज शरीफ ने पाक सेना को पीछे हटने का हुक्म दिया था. जाहिर है जो कुछ हुआ वो पाक फौज ने कराया और पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि वहां फौज की ही चलती है.  शरीफ ने अस्सी के दशक में सैन्य शासक जिया-उल-हक के दौर में राजनीति शुरू की थी. वक्त के साथ उनकी सियासी शैली में बदलाव आता गया. आर्मी की ताकत वो जल्द पहचान गए, इसलिए जब भी उन्हें मौका मिला भारत से रिश्ते सुधारने का कदम तो बढ़ाया लेकिन आर्मी के दबाव में फिर कदम खींच लिया.  नवाज शरीफ अकेले ऐसे नेता है जो रिकॉर्ड तीन बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. पहली बार नवंबर 1990 से जुलाई 1993 तक. दूसरी बार फरवरी 1997 में सत्ता संभाली और 1999 में तख्तापलट तक प्रधानमंत्री रहे. तीसरी बार 2013 में आम चुनाव जीतने के बाद फिर उन्हें प्रधानमंत्री की गद्दी मिली. लेकिन पनामा पेपर लीक ने शरीफ की जड़ें खोखली कर दीं, लंदन में मकान, लाहौर में जमीन, कई कंपनियों में हिस्सेदारी, काली कमाई के मायाजाल का ऐसा खुलासा हुआ कि शरीफ सलाखों में पहुंच गए.  बेआबरू होकर शरीफ का यूं जेल जाना भारत के लिए सही है या गलत ये तो इस बात से पता चलेगा कि पाकिस्तान की बागडोर किसके हाथों में आती है. फिलहाल इमरान खान की स्थिति मजबूत है और वो भारत के खिलाफ जहर उगलते नजर आ रहे हैं. पाकिस्तान के तमाशे को हिन्दुस्तान भी गौर से देख रहा है. दो राय नहीं इससे दोनों देश के रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

दरअसल चार साल पहले जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब नवाज शरीफ खास मेहमानों में शामिल थे. शपथ ग्रहण के करीब छह महीने बाद फिर वो लम्हा भी आया जब नवाज शरीफ की नातिन मेहरुन्निसा की सगाई में पाकिस्तान पहुंच गए. शरीफ की नातिन को आशीर्वाद दिया. उनकी पत्नी को शॉल भेंट की, इससे पहले जब शरीफ मोदी के शपथ ग्रहण में शरीक हुए थे तो उनकी पत्नी के लिए साड़ी लेकर आए थे.

पीएम नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ की साड़ी-शॉल कूटनीति से ऐसा लगा था कि आपसी गर्मजोशी का सकारात्मक असर भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर भी नजर आएगा लेकिन अफसोस ये गर्मजोशी यहीं तक रुक गई. शरीफ रिश्तों को सुधारने में बड़ा कुछ नहीं कर पाए.

बेशक पीएम मोदी ने पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का जो हाथ बढ़ाया था उसे थामने में शरीफ नाकाम रहे, लेकिन शरीफ को इस बात का श्रेय जाता है कि नब्बे के दशक में जब वो दूसरी बार पीएम बने थे तब उन्होंने भारत के साथ रिश्तों को बेहतर करने की कोशिश की थी. वो शरीफ का ही कार्यकाल था जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ऐतिहासिक लाहौर पर पहुंचे थे.

इस दौरे में भारत और पाकिस्तान के बीच एक करार हुआ था जिसे लाहौर समझौता कहा जाता है. इस समझौते से ये उम्मीद बंधी थी कि भारत-पाकिस्तान के तल्ख रिश्तों का दौर बदलेगा. लेकिन रिश्तों में सुधार की जो उम्मीद बंधी थी ऐसा हो नहीं पाया और थोड़े दिनों बाद कारगिल युद्ध के रूप में भारत को बड़ा धोखा हाथ लगा.

बेशक, कारगिल युद्ध के वक्त नवाज शरीफ पाकिस्तान के पीएम थे, लेकिन माना जाता है कि ये जंग उनके दिमाग की उपज नहीं थी. बाद में पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने कहा था कि नवाज शरीफ ने पाक सेना को पीछे हटने का हुक्म दिया था. जाहिर है जो कुछ हुआ वो पाक फौज ने कराया और पाकिस्तान का इतिहास गवाह है कि वहां फौज की ही चलती है.

शरीफ ने अस्सी के दशक में सैन्य शासक जिया-उल-हक के दौर में राजनीति शुरू की थी. वक्त के साथ उनकी सियासी शैली में बदलाव आता गया. आर्मी की ताकत वो जल्द पहचान गए, इसलिए जब भी उन्हें मौका मिला भारत से रिश्ते सुधारने का कदम तो बढ़ाया लेकिन आर्मी के दबाव में फिर कदम खींच लिया.

नवाज शरीफ अकेले ऐसे नेता है जो रिकॉर्ड तीन बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने. पहली बार नवंबर 1990 से जुलाई 1993 तक. दूसरी बार फरवरी 1997 में सत्ता संभाली और 1999 में तख्तापलट तक प्रधानमंत्री रहे. तीसरी बार 2013 में आम चुनाव जीतने के बाद फिर उन्हें प्रधानमंत्री की गद्दी मिली. लेकिन पनामा पेपर लीक ने शरीफ की जड़ें खोखली कर दीं, लंदन में मकान, लाहौर में जमीन, कई कंपनियों में हिस्सेदारी, काली कमाई के मायाजाल का ऐसा खुलासा हुआ कि शरीफ सलाखों में पहुंच गए.

बेआबरू होकर शरीफ का यूं जेल जाना भारत के लिए सही है या गलत ये तो इस बात से पता चलेगा कि पाकिस्तान की बागडोर किसके हाथों में आती है. फिलहाल इमरान खान की स्थिति मजबूत है और वो भारत के खिलाफ जहर उगलते नजर आ रहे हैं. पाकिस्तान के तमाशे को हिन्दुस्तान भी गौर से देख रहा है. दो राय नहीं इससे दोनों देश के रिश्तों पर भी असर पड़ेगा.

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