क्या है पूरी व्रत कथा – Shaurya Times | शौर्य टाइम्स https://www.shauryatimes.com Latest Hindi News Portal Tue, 01 Sep 2020 07:23:02 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0.2 जानिए क्यों मनाई जाती है अनंत चतुर्दशी, क्या है पूरी व्रत कथा https://www.shauryatimes.com/news/82602 Tue, 01 Sep 2020 07:23:02 +0000 http://www.shauryatimes.com/?p=82602 अनंत चतुर्दशी का पर्व आज मनाया जा रहा है. इस पर्व पर भगवान विष्णु के अनंत अवतारों का पूजन होता है इस वजह से इसे अनंत चतुर्दशी कहते है. वैसे आप जानते ही होंगे इस व्रत को करने से व्यक्ति को अनेकों गुना ज्यादा शुभ फलों की प्राप्ति होती है इस कारण इस दिन व्रत रखना चाहिए. आप जानते ही होंगे इस बार अनंत चतुर्दशी आज यानी 1 सितंबर 2020 को है. अब आज हम आपको बताने जा रहे हैं क्यों मनाते हैं अनंत चतुर्दशी, क्या है इसकी व्रत कथा.

जी दरअसल अनंत चतुर्दशी का व्रत सबसे पहले पांडवों द्वारा रखा गया था. वैसे इसके बारे में एक कथा है जो इस प्रकार है- ‘जब दुर्योदधन पांडवों से मिलने गया, तो माया महल का दृश्य देखकर धोखा खा गया. माया के कारण भूमि मानो जल के समान प्रतीत होती थी, और जल भूमि के समान… दुर्योधन ने भूमि को जल समझ कर अपने वस्त्र ऊपर कर लिए परंतु जल को भूमि समझ कर वह तालब में गिर गया. इस पर द्रोपदी ने उपहास करते हुए कहा “अंधे का पुत्र अंधा” इसी बात का प्रतिशोध लेने के लिए दुर्योधन ने अपने मामा शकुनी के साथ मिलकर षडयंत्र रचा, और पांडवों को जुए में पराजित करके भरी सभा में द्रोपदी का अपमान किया.पांडवों को बारह वर्ष का वनवास और एक वर्ष अज्ञात वास मिला, अपनी प्रतिज्ञा को पूरी करते हुए पांडव अनेक कष्टों को सहते हुए वन में रहने लगे. तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से इस दुख को दूर करने का उपाय पूछा इस पर कृष्ण जी ने युधिष्ठिर से कहा कि जुआ खेलने के कारण लक्ष्मी तुमसे रुष्ट हो गई हैं, तुम अनंत चतुर्दशी के दिन भगवान विष्णु का व्रत रखो. इससे तुम्हारा राज-पाठ तुम्हें वापस मिल जाएगा. तब इस व्रत का महत्व बताते हुए श्रीकृष्ण जी ने उन्हें एक कथा सुनाई.’

अनंत चतुर्दशी व्रत कथा- ‘बहुत समय पहले एक तपस्वी ब्राह्मण था जिसका नाम सुमंत और पत्नी का नाम दीक्षा था. उनकी सुशीला नाम की एक सुंदर और धर्मपरायण कन्या थी. जब सुशीला कुछ बड़ी हुई तो उसकी मां दीक्षा की मृत्यु हो गई. तब उनके पिता सुमंत ने कर्कशा नाम की स्त्री से विवाह कर लिया. जब सुमंत ने अपनी पुत्री का विवाह ऋषि कौंडिण्य के साथ किया तो कर्कशा ने विदाई में अपने जवांई को ईंट और पत्थर के टुकड़े बांध कर दे दिए. ऋषि कौडिण्य को ये व्यवहार बहुत बुरा लगा, वे दुखी मन के साथ अपनी सुशीला को विदा कराकर अपने साथ लेकर चल दिए, चलते-चलते रात्रि का समय हो गया.

तब सुशीला ने देखा कि संध्या के समय नदी के तट पर सुंदर वस्त्र धारण करके स्त्रियां किसी देवता का पूजन कर रही हैं. सुशीला ने जिज्ञाशावश उनसे पूछा तो उन्होंने अनंत व्रत की महत्ता सुनाई, तब सुशीला ने भी यह व्रत किया और पूजा करके चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में बांध कर ऋषि कौंडिण्य के पास आकर सारी बात बताई. ऋषि ने उस धागे को तोड़ कर अग्नि में डाल दिया. इससे भगवान अनंत का अपमान हुआ. परिणामस्वरुप ऋषि कौंडिण्य दुखी रहने लगे. उनकी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गई और वे दरिद्र हो गए. एक दिन उन्होंने अपनी पत्नी से कारण पूछा तो सुशीला ने दुख का कारण बताते हुए कहा कि आपने अनंत भगवान का डोरा जलाया है.

इसके बाद ऋषि कौंडिण्य को बहुत पश्चाताप हुआ, वे अनंत डोरे को प्राप्त करने के लिए वन चले गए. वन में कई दिनों तक ऐसे ही भटकने के बाद वे एक दिन भूमि पर गिर पड़े. तब भगवान अनंत ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि तुमने मेरा अपमान किया, जिसके कारण तुम्हें इतना कष्ट उठाना पड़ा, लेकिन अब तुमने पश्चाताप कर लिया है, मैं प्रसन्न हूं तुम घर जाकर अनंत व्रत को विधि पूर्वक करो. चौदह वर्षों तक व्रत करने से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जांएगे, और तुम दोबारा संपन्न हो जाओगे. ऋषि कौंडिण्य ने विधि पूर्वक व्रत किया और उन्हें सारें कष्टों से मुक्ति प्राप्त हुई.’

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