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	<title>गटर के पानी से लेकर बहादुरी तक &#8211; Shaurya Times | शौर्य टाइम्स</title>
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		<title>गटर के पानी से लेकर बहादुरी तक, ये है इन पांच पाक उम्मीदवारों की कहानी</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Jul 2018 06:44:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[पाकिस्तान चुनावों में अब कुछ ही दिन बचेे हैं। सभी छोटे-बड़े दल और नेता प्रचार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पाकिस्तानी राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है सभी उम्मीदवार जनता को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। प्रत्याशी अलग-अलग तरीके से प्रचार कर रहे हैं। आज हम आपको &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>पाकिस्तान चुनावों में अब कुछ ही दिन बचेे हैं। सभी छोटे-बड़े दल और नेता प्रचार में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। पाकिस्तानी राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है सभी उम्मीदवार जनता को लुभाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं। प्रत्याशी अलग-अलग तरीके से प्रचार कर रहे हैं। आज हम आपको ऐसे पांच उम्मीदवारों के बारे में बताने जा रहे हैं, जो अपने आप में बहुत खास है।<img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter  wp-image-6546" src="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/07/22_07_2018-pak_18225955.jpg" alt="अयाज कराची के एनए-243 से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्होंने अनोखा तरीका अपनाया है। कभी सीवर में तो कभी कूड़े के ढेर में बैठकर वो लोगों से खुद को वोट देने की अपील कर रहे हैं। यही नहीं अयाज वोट पाने के लिए गटर के पानी में भी बैठकर प्रचार करने से भी नहीं चूक रहे हैं। अयाज का चुनाव चिन्ह नल है। पाकिस्तान में जल संकट एक बहुत बड़ी समस्या है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2025 तक प्रति व्यक्ति को 500 घन मीटर से भी कम पानी मिलेगा। अयाज ने मतदाताओं से खुद को वोट देने की अपील की है।    पाक के पूर्व पीएम को हाई कोर्ट से मिली चुनाव लड़ने की इजाजत यह भी पढ़ें   रादेश सिंह टोनी   पाकिस्तान के चुनावों में भाग्य आजमाएगी हिंदू महिला यह भी पढ़ें रादेश सिंह टोनी रूढ़िवादी उत्तर पश्चिमी खैबर पख्तुनख्वा प्रांत में पाकिस्तान के सिख अल्पसंख्यक के पहले स्वतंत्र उम्मीदवार हैं। टोनी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो पाकिस्तान में सिखों समेत अन्य अल्पसंख्यकों और मुसलमानों की समस्याओं की बात करते हैं। उन्होंने स्थानीय निकाय के चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी को भारी मतों से मात दी थी। जिस सीट से टोनी चुनाव लड़ रहे हैं, वहां 160 सिख वोटर पंजीकृत हैं जबकि हिंदू वोटरों की तादाद 1250 है। वहां सबसे ज्यादा 1,30,000 मुस्लिम मतदाता हैं। उनके दो प्रतिद्वंद्वी आतंकी समूहों के साथ कठोर धार्मिक संगठनों द्वारा समर्थित दलों से आते हैं। उन्हें यह पता है कि यह मुकाबला बहुत मुश्किल है, लेकिन उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी।     पाक: निर्दलीय उम्मीदवार के पास 43 हजार करोड़ की संपत्ति, आधे मुज्जफरगढ़ का है मालिक यह भी पढ़ें एक महीने पहले ही पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा प्रांत के पेशावर में सिख धर्मगुरु चरणजीत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और उसके कुछ हफ्तों बाद चुनावी रैली में बम धमाका हुआ था, जिसमें 20 से ज्यादा लोग मारे गए थे।   अली वजीर   पाक चुनाव : इमरान खान के घोषणापत्र में भारत और कश्मीर का जिक्र, जानिए क्या-क्या शामिल यह भी पढ़ें दक्षिण वजीरिस्तान में आतंकियों और सेना के बीच युद्ध में अली वजीर ने अपना सब खो दिया। आतंकियों ने वजीर के 10 रिश्तेदारों की हत्या कर दी थी और उनके घर, बगीचे व पेट्रोल स्टेशन को भी तबाह कर दिया था। उस समय सेना ने एक दशक पहले पाकिस्तानी तालिबान से लड़ाई लड़ी थी, जिसके बाद उन्होंने आम नागरिकों को निशाना बनाया था। वजीर ने कभी किसी का समर्थन नहीं किया है। उन्होंने तालिबान और पाकिस्तान की शक्तिशाली सुरक्षा प्रतिष्ठान दोनों की जमकर आलोचना की।    नवाब अंबर शहजादा  आप जनाब सरकार पार्टी के प्रमुख नवाब डॉक्टर अंबर शहजादा खूब चर्चा में हैं। शहजादा अब तक 42 चुनाव हार चुके हैं। अंबर शहजादा एनए-125 लाहौर से चुनाव लड़ रहे हैं। यह वही निर्वाचन क्षेत्र है, जहां पीएमएल-एन ने मरयम नवाज और पीटीआइ ने डॉ यास्मीन रशीद को मैदान में उतारा है। अंबर शहजादा ने कहा कि वह दशकों से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन कभी मतदाताओं से वोट नहीं मांगा है। उन्होंने कहा कि मैंने लोगों से वोट कभी नहीं मांगे। मेरा लक्ष्य लोगों के बीच जागरूकता पैदा करना है। इस जागरुकता को पैदा करने के चक्कर में नवाब साहब 42 बार चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन एक बार भी विधानसभा नहीं पहुंच पाए हैं। हालांकि, उन्हें इस बात का कोई अफसोस भी नहीं है। वर्ष 2013 में तो उन्हें केवल 13 वोट मिले थे।    मीर अब्दुल करीम नौशेरवानी  मीर अब्दुल की विचारधारा अवसरवादी है। पाकिस्तान के सबसे गरीब और सबसे अस्थिर प्रांत दक्षिणी बलूचिस्तान के अब्दुल करीम 1985 से सात बार पार्टी बदल चुके हैं और स्वतंत्र उम्मीदवार को रूप में दो बार निर्वाचित किए जा चुके हैं। इस बार वह एक स्थानीय प्रांतीय संगठन बलूचिस्तान अवामी पार्टी के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।    एक अन्य संसद सदस्य ने कहा कि जब उन्हें लगता है कि पार्टी डूबनी वाली है या हारने वाली है तो वह दूसरी में शामिल हो जाते हैं। नौशेरवानी इससे पहले ड्राइवर का काम करते थे। 2002 और 2008 के चुनावों में भाग लेने में असमर्थ थे क्योंकि उन्होंने स्कूल से स्नातक नहीं किया था।" width="673" height="559" srcset="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/07/22_07_2018-pak_18225955.jpg 650w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/07/22_07_2018-pak_18225955-300x249.jpg 300w" sizes="(max-width: 673px) 100vw, 673px" /></strong></p>
<p><strong>अयाज कराची के एनए-243 से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उन्होंने अनोखा तरीका अपनाया है। कभी सीवर में तो कभी कूड़े के ढेर में बैठकर वो लोगों से खुद को वोट देने की अपील कर रहे हैं। यही नहीं अयाज वोट पाने के लिए गटर के पानी में भी बैठकर प्रचार करने से भी नहीं चूक रहे हैं। अयाज का चुनाव चिन्ह नल है। पाकिस्तान में जल संकट एक बहुत बड़ी समस्या है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2025 तक प्रति व्यक्ति को 500 घन मीटर से भी कम पानी मिलेगा। अयाज ने मतदाताओं से खुद को वोट देने की अपील की है। </strong></p>
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<p><strong>रादेश सिंह टोनी</strong></p>
<p><strong>रादेश सिंह टोनी रूढ़िवादी उत्तर पश्चिमी खैबर पख्तुनख्वा प्रांत में पाकिस्तान के सिख अल्पसंख्यक के पहले स्वतंत्र उम्मीदवार हैं। टोनी एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो पाकिस्तान में सिखों समेत अन्य अल्पसंख्यकों और मुसलमानों की समस्याओं की बात करते हैं। उन्होंने स्थानीय निकाय के चुनाव में अपने प्रतिद्वंद्वी को भारी मतों से मात दी थी। जिस सीट से टोनी चुनाव लड़ रहे हैं, वहां 160 सिख वोटर पंजीकृत हैं जबकि हिंदू वोटरों की तादाद 1250 है। वहां सबसे ज्यादा 1,30,000 मुस्लिम मतदाता हैं। उनके दो प्रतिद्वंद्वी आतंकी समूहों के साथ कठोर धार्मिक संगठनों द्वारा समर्थित दलों से आते हैं। उन्हें यह पता है कि यह मुकाबला बहुत मुश्किल है, लेकिन उन्होंने फिर भी हार नहीं मानी।</strong></p>
<p><strong>एक महीने पहले ही पाकिस्तान के खैबर पख्तूनवा प्रांत के पेशावर में सिख धर्मगुरु चरणजीत सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी और उसके कुछ हफ्तों बाद चुनावी रैली में बम धमाका हुआ था, जिसमें 20 से ज्यादा लोग मारे गए थे। </strong></p>
<p><strong>अली वजीर</strong></p>
<p><strong>दक्षिण वजीरिस्तान में आतंकियों और सेना के बीच युद्ध में अली वजीर ने अपना सब खो दिया। आतंकियों ने वजीर के 10 रिश्तेदारों की हत्या कर दी थी और उनके घर, बगीचे व पेट्रोल स्टेशन को भी तबाह कर दिया था। उस समय सेना ने एक दशक पहले पाकिस्तानी तालिबान से लड़ाई लड़ी थी, जिसके बाद उन्होंने आम नागरिकों को निशाना बनाया था। वजीर ने कभी किसी का समर्थन नहीं किया है। उन्होंने तालिबान और पाकिस्तान की शक्तिशाली सुरक्षा प्रतिष्ठान दोनों की जमकर आलोचना की।</strong></p>
<p><strong>नवाब अंबर शहजादा</strong></p>
<p><strong>आप जनाब सरकार पार्टी के प्रमुख नवाब डॉक्टर अंबर शहजादा खूब चर्चा में हैं। शहजादा अब तक 42 चुनाव हार चुके हैं। अंबर शहजादा एनए-125 लाहौर से चुनाव लड़ रहे हैं। यह वही निर्वाचन क्षेत्र है, जहां पीएमएल-एन ने मरयम नवाज और पीटीआइ ने डॉ यास्मीन रशीद को मैदान में उतारा है। अंबर शहजादा ने कहा कि वह दशकों से चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन कभी मतदाताओं से वोट नहीं मांगा है। उन्होंने कहा कि मैंने लोगों से वोट कभी नहीं मांगे। मेरा लक्ष्य लोगों के बीच जागरूकता पैदा करना है। इस जागरुकता को पैदा करने के चक्कर में नवाब साहब 42 बार चुनाव लड़ चुके हैं, लेकिन एक बार भी विधानसभा नहीं पहुंच पाए हैं। हालांकि, उन्हें इस बात का कोई अफसोस भी नहीं है। वर्ष 2013 में तो उन्हें केवल 13 वोट मिले थे।</strong></p>
<p><strong>मीर अब्दुल करीम नौशेरवानी</strong></p>
<p><strong>मीर अब्दुल की विचारधारा अवसरवादी है। पाकिस्तान के सबसे गरीब और सबसे अस्थिर प्रांत दक्षिणी बलूचिस्तान के अब्दुल करीम 1985 से सात बार पार्टी बदल चुके हैं और स्वतंत्र उम्मीदवार को रूप में दो बार निर्वाचित किए जा चुके हैं। इस बार वह एक स्थानीय प्रांतीय संगठन बलूचिस्तान अवामी पार्टी के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।</strong></p>
<p><strong>एक अन्य संसद सदस्य ने कहा कि जब उन्हें लगता है कि पार्टी डूबनी वाली है या हारने वाली है तो वह दूसरी में शामिल हो जाते हैं। नौशेरवानी इससे पहले ड्राइवर का काम करते थे। 2002 और 2008 के चुनावों में भाग लेने में असमर्थ थे क्योंकि उन्होंने स्कूल से स्नातक नहीं किया था।</strong></p>
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