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	<title>जानिए: आप खुद को कितना जानते हैं! &#8211; Shaurya Times | शौर्य टाइम्स</title>
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		<title>जानिए: आप खुद को कितना जानते हैं!</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Oct 2018 08:36:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[हम खुद के बारे में कितना जानते हैं! अक्‍सर इस बात का जवाब कुछ यूं मिलता है कि सवाल करने वाले का हौसला ही खत्‍म हो जाता है. हम कितना दावा करते हैं कि हम अपने बारे में बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन अक्‍सर यह दावा गलत साबित होता है.कमाल की बात तो यह होती &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>हम खुद के बारे में कितना जानते हैं! अक्&#x200d;सर इस बात का जवाब कुछ यूं मिलता है कि सवाल करने वाले का हौसला ही खत्&#x200d;म हो जाता है. हम कितना दावा करते हैं कि हम अपने बारे में बहुत कुछ जानते हैं, लेकिन अक्&#x200d;सर यह दावा गलत साबित होता है.<img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter  wp-image-12857" src="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_15.jpg" alt=" जानिए: आप खुद को कितना जानते हैं!" width="499" height="281" srcset="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_15.jpg 1280w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_15-300x169.jpg 300w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_15-768x432.jpg 768w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_15-1024x576.jpg 1024w" sizes="(max-width: 499px) 100vw, 499px" />कमाल की बात तो यह होती है कि जब-जब दावा गलत साबित होता है, हम तर्क की गलियों में भटकने लगते हैं. खुद के लिए कोई महफूज कोना खोजने में जुट जाते हैं. इससे हम आखिर में साबित कर देते हैं कि मैं खुद को बहुत अच्&#x200d;छे से जानता हूं. आपको ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो हर दूसरी बात पर यह दावा करते नजर आ जाएंगे कि मैं दूसरों को तो नहीं लेकिन खुद को अच्&#x200d;छे से समझता\जानता हूं.</strong></p>
<p><strong>मेरा यहां विनम्र निवेदन है कि इस बात के लिए थोडा ठहरिए, सोचिए कि हम स्&#x200d;वयं को कितना कम जानते हैं. इसीलिए जिंदगी के चौराहे में अक्&#x200d;सर ऐसी दिशा में मुड़ जाते हैं जो हमारे स्&#x200d;वभाव, नजरिए के एकदम उल्&#x200d;ट होती है.</strong></p>
<p><strong>हम होते इतने नरम हैं कि हवा का झोका हमें पलट दे और रास्&#x200d;ता बर्फीला पकड़ लेते हैं. तो कहीं दिखेगा कि तूफानों को हराने वाला ऐसी नाव में सवार हो गया जो उसे महासागर तो दूर ‘झुमरी तलैया’ भी पार नहीं करा सकती.</strong></p>
<p><strong>अपने को जानना ‘दुनिया’ को जानने से कहीं अधिक मुश्किल, जरूरी है. इससे सही नदी, नाव और किनारे को पहचानने में आसानी होती है! दूसरों को पहचानने में गलती को सुधारा जा सकता है, लेकिन स्&#x200d;वयं के प्रति हुई चूक को सुधारने का मौका मिलना आसान नहीं.</strong></p>
<p><strong>एक मिसाल लेते चलते हैं… कहानी भोपाल की है. इसका साक्षी मैं स्&#x200d;वयं हूं.</strong></p>
<p><strong>वह एमएससी टॉपर थे, अपने जिले, संभाग के नहीं मप्र के थे. टॉपर भी आज के नहीं, बल्कि नब्&#x200d;बे के दशक के. जब टॉपर का अर्थ ऐसी योग्&#x200d;यता का अटूट प्रमाण होता था. टॉपर के लिए समाज के मन में सम्&#x200d;मान से लेकर नौकरी मिलने के रास्&#x200d;ते भी सुगम माने जाते थे. वह आईएएस, दूसरी बड़ी परीक्षा की तैयारी करने भोपाल पहुंच गए. तैयारी में जुट गए. उनके परिश्रम ने सबका ध्&#x200d;यान अपनी ओर खींचा.</strong></p>
<p><strong>एक दिन वहां मप्र पुलिस के जवानों की भर्ती हो रही थी. उनकी कद काठी एकदम अमिताभ बच्&#x200d;चन वाली है. इसलिए उनके एक सुपरिचित ने कहा कि भर्ती में तुमको जाना चाहिए. तुम्&#x200d;हारा चयन हो ही जाएगा. इस टॉपर के मन में आया कि मैं और पुलिस का जवान की भर्ती. मुझे तो कम से कम आईपीएस अफसर बनना है. लेकिन वह बड़ों का कहना नहीं टाल सके. </strong></p>
<p><strong>वह पुलिस की भर्ती में गए और चुन लिए गए. सबने उनको बधाई दी. समझाया कि बेटा कितने किस्&#x200d;मत वाले हो! बिना रिश्&#x200d;वत, सिफारिश के पुलिस की नौकरी मिल गई. उस वक्&#x200d;त मैं भी भोपाल में ही था. कुल जमा नौंवी का छात्र था.</strong></p>
<p><strong>फि&#x200d;र भी मैंने उनसे जो कि रिश्&#x200d;ते में हमारे मामा हैं, कहा, ‘आपको यह नौकरी नहीं करनी चाहिए. जब आपमें आईपीएस अफसर बनने की योग्&#x200d;यता है तो सिपाही क्&#x200d;यों. एक बार सिपाही हो गए तो कभी उस मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे, जो आपका ख्&#x200d;वाब है.’</strong></p>
<p><strong>लेकिन मैं छोटा था, उस वक्&#x200d;त अपने रिजल्&#x200d;ट से जूझता हुआ बच्&#x200d;चा था! जैसा बच्&#x200d;चों के साथ अब होता है, तब भी होता था. मेरी बात की ओर किसी ने ध्&#x200d;यान नहीं दिया. एक शानदार नौजवान ने सिपाही की नौकरी ज्&#x200d;वाइन कर ली. हमारा सिस्&#x200d;टम इतना सहयोगी नहीं कि वह बहुत दूर निकल पाते. आज लगभग पच्&#x200d;चीस बरस बाद वह दो चार कदम ही उस पद से आगे बढ़ पाए हैं.</strong></p>
<p><strong>काश! वह खुद को अच्&#x200d;छी तरह समझते. वैसे इससे भी जरूरी यह होता कि उन्&#x200d;हें स्&#x200d;वयं पर दूसरों की समझ से अधिक भरोसा होता. अपने भीतर हुनर होने जितना ही जरूरी यह भी है कि आपको उस पर यकीन हो.</strong></p>
<p><strong>जीवन के संघर्ष का हासिल उसकी योग्&#x200d;यता से कहीं अधिक उस जज्&#x200d;बे से होता है, जिसे हम यकीन कहते हैं. खुद में यकीन. अक्&#x200d;सर लोग कहते हैं कि उन्&#x200d;हें किसी में बड़ा भरोसा है. उस पर बहुत विश्&#x200d;वास है, उनसे दो मिनट बात कीजिए तो पता चल जाएगा कि उन्&#x200d;हें खुद पर कितना कम यकीन है.</strong></p>
<p><strong>जिसे खुद पर ही यकीन नहीं. वह दूसरे को क्&#x200d;या और कितना समझेगा, यह लिखने की जरूरत नहीं! इसलिए हमें दुनिया को जानने के मिशन, दावों पर निकलने से पहले अपने बारे में निश्&#x200d;चित होने की जरूरत है. हमारे सुख, प्रसन्&#x200d;नता, ‘जीवन -आनंद’ के सारे रास्&#x200d;ते यहीं से होकर जाते हैं.</strong></p>
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