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	<title>बस में तैनात मार्शल और कंडक्टर को हर कोई कर रहा सलाम &#8211; Shaurya Times | शौर्य टाइम्स</title>
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		<title>बस में तैनात मार्शल और कंडक्टर को हर कोई कर रहा सलाम, पेश की बहादुरी की मिशाल</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Nov 2019 10:30:40 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[दिल्ली]]></category>
		<category><![CDATA[पेश की बहादुरी की मिशाल]]></category>
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					<description><![CDATA[ ‘मेरी भी पांच साल की बेटी है। वैसे भी हर बच्ची मुङो अपनी बिटिया ही लगती है। उस मासूम बेटी को बचाना मेरा फर्ज था। हमने वही किया जो हर किसी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है..।’ यह कहना है 28 वर्षीय वीरेंद्र डांगी का। दिल्ली परिवहन विभाग के कैर बस डिपो में बतौर कंडक्टर तैनात &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong> </strong>‘मेरी भी पांच साल की बेटी है। वैसे भी हर बच्ची मुङो अपनी बिटिया ही लगती है। उस मासूम बेटी को बचाना मेरा फर्ज था। हमने वही किया जो हर किसी की नैतिक जिम्मेदारी बनती है..।’ यह कहना है 28 वर्षीय वीरेंद्र डांगी का। दिल्ली परिवहन विभाग के कैर बस डिपो में बतौर कंडक्टर तैनात वीरेंद्र कहते हैं, ‘यूं तो हर दिन सुबह से शाम तक सैकड़ों सवारी बस में सफर कर अपनी मंजिल तक पहुंचती हैं। अपने नैतिक कर्तव्य के नाते अक्सर ही बुजुर्ग और दिव्यांगों का सहयोग करते हैं। लेकिन पहली बार ईश्वर ने मुङो एक मासूम बच्ची को दरिंदे के हाथों से बचाने का अवसर दिया और उस चार वर्षीय बच्ची को उसकी मां की ममता तक पहुंचाने का जरिया बनाया। यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है कि मैं एक नेक काम कर सका।’<img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-66739" src="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2019/11/26_11_2019-dtc_bus_child_19790672.jpg" alt="" width="650" height="589" /></p>
<p>वीरेंद्र ने कहा, ‘हर किसी को ऐसा करना चाहिए, लेकिन हम डर जाते हैं कि कहीं पुलिस और कोर्ट के चक्कर न लगाने पड़ें। यह सब सोचने से पहले एक बात हर किसी को सोचनी चाहिए कि ईश्वर आपको किसी की मदद के लिए चुन रहा है तो आपके साथ कभी कुछ गलत नहीं होगा। मैं भविष्य में भी ऐसे नैतिक कर्तव्यों की राह पर अग्रसर रहूंगा। मैं उस वक्त यही सोच रहा था कि मेरे भी तो घर में बेटी है। भगवान न करे उसके साथ कुछ ऐसा हो जाता तो मेरा क्या होता। यह खयाल आते ही मैं इस बच्ची की रक्षा को आतुर हो उठा..।’</p>
<p><strong>बच्ची बेहद डरी-सहमी थी</strong></p>
<p>वीरेंद्र ने उस घटना को याद करते हुए बताया, ‘20 नवंबर को मैं 728 बस नंबर में बतौर कंडक्टर अपनी ड्यूटी पर था। एक युवक छोटी सी बच्ची को लेकर बस में चढ़ा। बच्ची बेहद डरी-सहमी दिख रही थी। लगातार रो भी रही थी और वह युवक उसके साथ बेरुखी से पेश आ रहा था। मुझे कुछ अंदेशा हुआ और बस में तैनात मार्शल अरुण ने भी स्थिति को भांप लिया। हमने बस चालक से दरवाजे बंद करने को कहा और गाड़ी को पुलिस स्टेशन की ओर मोड़ दिया गया..।’</p>
<p>बस में तैनात 24 वर्षीय मार्शल अरुण कुमार ने कहा, ‘मैं चार साल से सिविल डिफेंस सेवा में कार्यरत हूं, दिल्ली परिवहन में बतौर मार्शल तो पिछले माह 30 अक्टूबर को ही नियुक्ति हुई है। 20 नवंबर को सुबह 11 बजे वह युवक पालम स्टेशन के पास से बस में चढ़ा। उसे धौलाकुआं उतरना था। वह बच्ची को पकड़े हुआ था और बच्ची रो रही थी। हमें शक हुआ और हमने उस युवक से पूछताछ की। वह बस से कूदकर भागने की कोशिश में था। हमने तुरंत बस के गेट बंद कर दिए। दरअसल, वह युवक बच्ची को गलत नीयत से निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से उठा लाया था।</p>
<p><strong>बच्ची को सकुशल मां तक पहुंचाया</strong></p>
<p>बच्ची का परिवार मप्र के टीकमगढ़ से यहां मजदूरी को आया था। बच्ची बहुत डरी हुई थी। दरिंदे के चंगुल से छुड़ाने के बाद बस उसे हमने बस में मौजूद महिला सवारियों के पास बैठाया, तब बच्ची सामान्य हुई। इसके बाद धौलाकुआं पुलिस थाने में बस रोक कर आरोपित युवक को पुलिस के हवाले कर दिया..।’ अरुण ने कहा, ‘मुझे खुशी इस बात की हुई कि हम सबने मिलकर उस बच्ची को उसकी मां तक पहुंचाया। यह बेहद खुशी और संतोष का क्षण था। मैंने उसे माता-पिता को सौंपते हुए एक ही बात कही कि छोटे बच्चों को बाहर लेकर जाते वक्त बहुत चौकस रहना चाहिए। बच्ची के माता-पिता ने बहुत आभार व्यक्त किया..।’</p>
<p>अरुण कहते हैं कि अपने लिए तो सब जीते हैं दूसरों के लिए भी जीना चाहिए। मैं इसी सिद्धांत पर जीवन जीना चाहता हूं। शायद इसीलिए भगवान ने मुझे इस नेक काम के लिए चुना..।प्रेरणा के काम आए यह सम्मान.. अरुण कहते हैं कि उस दिन घटना के बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मुझे बधाई देकर सम्मानित करने की बात कही तो इससे हिम्मत और बढ़ी। वहीं वीरेंद्र कहते हैं कि रेलवे ने सम्मानित किया, दिल्ली सरकार भी ऐसा करने को कह रही है, इससे उत्साह तो बढ़ता है, लेकिन समाज में अन्य लोग भी इससे प्रेरित हो सकें तो मासूमों की जान बचेगी।</p>
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