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	<title>भारत में हर 13 में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी से पीड़ित है. अगले पांच बरस में यह अनुपात हर पांच में से एक व्यक्ति तक पहुंच सकता है. &#8211; Shaurya Times | शौर्य टाइम्स</title>
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		<title>भारत में हर 13 में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी से पीड़ित है. अगले पांच बरस में यह अनुपात हर पांच में से एक व्यक्ति तक पहुंच सकता है.</title>
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		<pubDate>Fri, 12 Oct 2018 09:36:19 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
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					<description><![CDATA[जिस एक रिश्‍ते में हमें सबसे अधिक किसी के साथ रहते हुए एक दूजे का ख्‍याल रखना होता है, वह विवाह है. इसलिए, एक दूसरे को न समझने के ‘गिले-शिकवे’ सबसे अधिक यहीं से आते हैं. दंपति के बीच ‘समझ’ बढ़ने के साथ चुनौती भी बढ़ गई. परवरिश, दांपत्‍य जीवन का सबसे बड़ी परीक्षा है.एक &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>जिस एक रिश्&#x200d;ते में हमें सबसे अधिक किसी के साथ रहते हुए एक दूजे का ख्&#x200d;याल रखना होता है, वह विवाह है. इसलिए, एक दूसरे को न समझने के ‘गिले-शिकवे’ सबसे अधिक यहीं से आते हैं. दंपति के बीच ‘समझ’ बढ़ने के साथ चुनौती भी बढ़ गई. परवरिश, दांपत्&#x200d;य जीवन का सबसे बड़ी परीक्षा है.<img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter  wp-image-13870" src="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/download-19.jpg" alt="" width="546" height="306" />एक संयुक्&#x200d;त परिवार से सफर आरंभ करते हैं, उसके बाद धीरे-धीरे महानगर में ‘हम दो और हमारे दो’ के बीच सिमट कर रह जाते हैं. इससे न केवल बच्&#x200d;चों को मिलने वाली स्&#x200d;नेह, प्रेम और आत्&#x200d;मीयता की धूप कम हो रही है, बल्कि हमें समझाने, संबल देने वाले ‘बड़ों’ का साथ भी सीमित होता जा रहा है.</strong></p>
<p><strong>यह विभाजन अनिवार्य दिखता है. करियर के अवसर, शिक्षा और सेहत की सीमित सुविधा इस पलायन को हर दिन और अधिक जरूरी बनाते जा रहे हैं.</strong></p>
<p><strong>यह कुछ ऐसा है कि आपको सुबह पता चलता है कि बाढ़ का पानी दोपहर तक आपके गांव को घेर लेगा. इतना ही वक्&#x200d;त बचा है, अपना सामान समेटकर यहां से निकलना होगा. कोई विकल्&#x200d;प नहीं है. बस निकलिए, नए सफर को!</strong></p>
<p><strong>इसलिए, छोटे परिवार, पति-पत्&#x200d;नी और बच्&#x200d;चों में सिमट परिवार हमारे समय की कठोर सच्&#x200d;चाई हैं. इनको मिलकर, अपनी दुनिया के संकट का सामना करना है, उनसे निकलने के रास्&#x200d;ते तलाशने हैं.</strong></p>
<p><strong>परवरिश पर सवाल, संकट के कुछ उदाहरण…</strong></p>
<p><strong>उन्&#x200d;नीस बरस के एक बच्&#x200d;चे को माता-पिता की पढ़ाई को लेकर दी जाने वाली सलाह, पाबंदियां इतनी अखरीं कि उसने उनके साथ अपनी बहन की हत्&#x200d;या यह सोचकर करने का फैसला कर लिया कि ‘अब नहीं सहा जाता’. यह मध्&#x200d;यमवर्गीय परिवार दिल्&#x200d;ली में रहता था.</strong></p>
<p><strong>दिल्&#x200d;ली के ही एक बड़े बिजनेसमैन की हत्&#x200d;या की खबर सुर्खियों में रही. उनके बेटे ने ही ऐसा इसलिए किया, क्&#x200d;योंकि पिता मनचाही रकम नहीं दे रहे थे. इसके साथ ही यह भी बात सामने आई कि पिता पहले बेटे की अक्&#x200d;सर पिटाई करते थे. उनका व्&#x200d;यवहार रूखा था.</strong></p>
<p><strong>देश में मानसिक रोगों का इलाज करने वाले सबसे बड़े संस्&#x200d;थान ‘नेशनल इंस्&#x200d;टीटयूट ऑफ मेंटल हेल्&#x200d;थ एंड न्&#x200d;यूरो साइंसेस’, बेंगलुरू के मुताबिक भारत में 80 प्रतिशत युवा गुस्से में हैं. इसके अध्&#x200d;ययन के अनुसार, करीब 35 प्रतिशत युवाओं ने ये माना है कि वह गुस्सा आने पर अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं. करीब 21 प्रतिशत युवा गुस्से में मारपीट भी करते हैं.</strong></p>
<p><strong>इसके अध्&#x200d;ययन में जिस पर सबसे अधिक ध्&#x200d;यान दिया जाना चाहिए, वह है 37 प्रतिशत युवाओं का यह मानना कि माता-पिता के सख़्त व्यवहार की वजह से वो मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं. </strong></p>
<p><strong>‘वर्ल्&#x200d;ड हेल्&#x200d;थ आर्गेनाईजेशन’ के मुताबिक भारत में हर 13 में से एक व्यक्ति मानसिक बीमारी से पीड़ित है. अगले पांच बरस में यह अनुपात हर पांच में से एक व्यक्ति तक पहुंच सकता है.</strong></p>
<p><strong>घर-घर तक इंटरनेट की पहुंच पर हम कितना भी इतरा लें, लेकिन सच तो यही है कि एक समाज के रूप में हम उसे संभालने के लिए ठीक से तैयार नहीं हैं. कोई चीज़ कितनी ही भली क्&#x200d;यों न हो, लेकिन अगर उसे आप संभालना नहीं जानते तो उसे बिगड़ते देर नहीं लगती.</strong></p>
<p><strong>तो फिर यह तो इंटरनेट का मामला है. जिस पर दुनियाभर की कंपनियों, व्&#x200d;यापारियों की नजर है. इंटरनेट और स्&#x200d;मार्टफोन मिलकर एक ऐसी दुनिया रच रहे हैं, जो हमें घर,स्&#x200d;कूल और परिवार के बीच ‘सोशल’ दुनिया में निरंतर अकेलेपन की ओर धकेल रही है.</strong></p>
<p><strong>बच्&#x200d;चे निरंतर समाज से दूर हो रहे हैं. माता-पिता के पास समय नहीं. बुजुर्ग दूर हैं. ऐसे में वह बच्&#x200d;चों को फोन थमा देते हैं. इसमें कुछ हद तक भाव होता है, ‘हमें परेशान मत करो, अपना फोन संभालो और शांत रहो’.</strong></p>
<p><strong>स्&#x200d;मार्टफोन के सहारे बच्&#x200d;चे इंटरनेट की दुनिया में कहां तक उतर गए हैं, इसका पता हमें तब जाकर चलता है, जब किसी दिन ‘ब्&#x200d;लू व्&#x200d;हेल’ जैसे खतरे सामने आते हैं. भारत ही नहीं अमेरिका, यूरोप सब जगह की सरकार इंटनरेट के आगे लगभग असहाय हैं. बच्&#x200d;चे वहीं अधिक सुरक्षित रहेंगे, जहां समाज अपनी भूमिका अधिक सजगता, स्&#x200d;नेह से निभाएगा.</strong></p>
<p><strong>हमें हर कीमत पर बच्&#x200d;चे को समय, स्&#x200d;नेह और साथ मुहैया कराना होगा. ध्&#x200d;यान रहे, बच्&#x200d;चों को सुविधा मजबूत नहीं बनाती, उसे मुंहमांगी चीजें न मिलने पर वह कमजोर नहीं होता. हम बड़े ही इस उधेड़बुन में उसे दूसरी ओर धकेल रहे हैं. हम उसे अधिक सुख देने के चक्&#x200d;कर में उसे उसके हिस्&#x200d;से के स्&#x200d;नेह से दूर कर रहे हैं, यही परवरिश का सबसे बड़ा संकट है.</strong></p>
<p><strong>बच्&#x200d;चों पर हिंसा, उससे की जाने वाली सख्&#x200d;ती सब आप पर ही लौटकर आनी है. इसलिए जो भी करें, उसमें सबसे पहले अपने ‘रिटर्न’ का ख्&#x200d;याल जरूर रहे.</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
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