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	<title>संक्रामक विचार प्रक्रिया का ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ है &#8211; Shaurya Times | शौर्य टाइम्स</title>
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		<title>संक्रामक विचार प्रक्रिया का ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ है, जो अपने साथ निराशा, दुख, ईर्ष्‍या और गहरी उदासी को साथ लिए चलता है.</title>
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		<pubDate>Thu, 04 Oct 2018 07:59:34 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[जीवनशैली]]></category>
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					<description><![CDATA[हम सब का मूल स्‍वभाव साथ रहना है. एक दूसरे का साथ देना, चाहना हमारी आदिम आदत रही है. संभवत: इसलिए तो अरस्‍तु ने हमें सामाजिक प्राणी कहा है. वह केवल प्राणी कहकर भी काम चला सकते थे, लेकिन सामाजिक इसलिए कहा, क्‍योंकि वह देख रहे थे कि कैसे अकेले-अकेले रहते हुए हम एक साथ &#8230;]]></description>
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<p>हम सब का मूल स्&#x200d;वभाव साथ रहना है. एक दूसरे का साथ देना, चाहना हमारी आदिम आदत रही है. संभवत: इसलिए तो अरस्&#x200d;तु ने हमें सामाजिक प्राणी कहा है. वह केवल प्राणी कहकर भी काम चला सकते थे, लेकिन सामाजिक इसलिए कहा, क्&#x200d;योंकि वह देख रहे थे कि कैसे अकेले-अकेले रहते हुए हम एक साथ आए हैं. मनुष्&#x200d;य के सफर की शुरुआत अकेलेपन से हुई, उसने साथ रहना ‘सीखा’ है. एक अकेली गुफा से आरंभ हुई यात्रा ही तो कबीले, गांव, कस्&#x200d;बे और महानगर से होते हुए रात-दिन रोशन रहने वाली धरती के रूप में बदली है.  <img fetchpriority="high" decoding="async" class="aligncenter  wp-image-12936" src="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_7.jpg" alt="   संक्रामक विचार प्रक्रिया का ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ है, जो अपने साथ निराशा, दुख, ईर्ष्&#x200d;या और गहरी उदासी को साथ लिए चलता है." width="606" height="341" srcset="https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_7.jpg 1280w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_7-300x169.jpg 300w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_7-768x432.jpg 768w, https://www.shauryatimes.com/wp-content/uploads/2018/10/00000003_7-1024x576.jpg 1024w" sizes="(max-width: 606px) 100vw, 606px" /></p>
<p>इस यात्रा में हमारा आकार भी बदला. हम प्रकृति से दूर हुए. दूर से अधिक हमने उसे नियंत्रित करने की कोशिश की. इस ‘कोशिश’ के तनाव से ‘देवदार’ सरीखे इंसान गमलों जैसे दिखने लगे तो इसका मन, सोच पर असर पड़ना सहज ही माना जाएगा. अब पूरी दुनिया अकेलेपन, उदासी, कुंठा और डिप्रेशन की ओर बढ़ रही है. यह मनुष्&#x200d;य के रूप में हमारी यात्रा का एक ऐसा पड़ाव है, जहां हमारी चेतना में ऐसे बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जो मनुष्&#x200d;य की यात्रा को किसी नए तट की ओर धकेलने वाले हैं.</p>
<p>असल में प्रकृति/नेचर दुनिया की सबसे बड़ी शिक्षक, विज्ञान है. उसके पास हर समस्&#x200d;या का समाधान है. हां, उसे जानने समझने के लिए वैसी दृष्टि का होना जरूरी है. बाकी बातें फिर कभी आज हम मनुष्&#x200d;य के मूल स्&#x200d;वभाव मिठास के कम होते जाने और अकेलेपन के बढ़ते जाने पर बात केंद्रित रखते हैं.</p>
<p>अगर आप किसी डॉक्&#x200d;टर से कहें कि आज सबसे बड़ी बीमारी कौन सी है. जो मनुष्&#x200d;य समाज के लिए सबसे अधिक घातक है, तो वह बहुत से विकल्&#x200d;प के बीच वह कह सकते हैं, डायबिटीज. क्&#x200d;योंकि वह हमारी संपूर्ण जीवन पद्धति को बाधित करने का काम कर सकती है. मैं इसमें केवल एक ही चीज़ जोड़ना चाहता हूं कि डायबिटीज से कहीं अधिक घातक अकेलापन है. अकेलापन, केवल अकेले रहना नहीं है. यह तो उस संक्रामक विचार प्रक्रिया का ‘टिप ऑफ आइसबर्ग’ है, जो अपने साथ निराशा, दुख, ईर्ष्&#x200d;या और गहरी उदासी को साथ लिए चलता है.</p>
<p>इस लेख की तैयार के दौरान मुझे बीबीसी की एक रिपोर्ट मिली. जिसने अकेलेपन के प्रति मेरी समझ को बल दिया. इसमें ‘ब्रिटिश रॉयल कॉलेज ऑफ़ जनरल प्रैक्टिशनर्स’ के हवाले से बताया गया है कि अकेलापन डायबिटीज जैसी भयानक बीमारी है. इससे भी उतने ही लोगों की मौत होती है, जितनी डायबिटीज़ की वजह से. अकेलापन हमारे सोचने-समझने की ताक़त को कमज़ोर करता है. अकेला रहना हमारी अक़्लमंदी पर बहुत खराब असर डालता है. बीमारियों से लड़ने की हमारी क्षमता कम होती है. तो इस अर्थ में डायबिटिज पर अकेलापन कहीं भारी है.</p>
<p>डिप्रेशन, उदासी भारत में देर से कदम रख रहे हैं, इनका सफर तो आपके प्रिय देश अमेरिका, ब्रिटेन से आरंभ हुआ. सिगमंड फ्रायड कहां से आए. कितने पहले वह संभलने को कह गए! उनके समाज हमारी तुलना में अधिक भौतिकवादी रहे. संपन्&#x200d;न रहे. अविष्&#x200d;कार वहीं होते रहे हैं. दुनिया की सबसे अच्&#x200d;छी मशीनें, कारखाने वहीं  हैं. आज के संदर्भ में समझना है तो आईफोन एक सरल मिसाल है.</p>
<p>एप्&#x200d;पल को अमेरिकन समाज के लिए हम साल छह महीने में नया वर्जन देना होता है, क्&#x200d;योंकि इतनी ही देर में वह पुराने से ऊब जाता है. जहां समाज बहुत अधिक संपन्&#x200d;न होगा, वहां जीवन के प्रति अलग, निजी नजरिया और रिश्&#x200d;तों में तनाव का स्&#x200d;तर कुछ और होगा.</p>
<p>आत्&#x200d;मीयता की आंच समय, स्&#x200d;नेह के तंदूर में ही बढ़ती है. जहां हसरतों की ऊंची लहर होगी, वहां प्रेम का पीछे छूटते जाना स्&#x200d;वाभाविक ही है. लेकिन भारत में जहां यूरोप, अमेरिका की तुलना साधन, सुविधा से करना संभव नहीं वहां समय से पहले हमारे लोगों को ऊबते जाना, अकेले होते जाना चौंकाने वाला है.</p>
<p>असल में उदारीकरण के रास्&#x200d;ते हमने पूरी दुनिया, बाजार को अपने घर में आने तो दिया,  लेकिन उसके लिए हमारा समाज, सोच और बच्&#x200d;चे एकदम तैयार नहीं थे. इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि हमने इस ओर ध्&#x200d;यान ही नहीं दिया. हमने ध्&#x200d;यान नहीं दिया कि शहरों में रोजगार बढ़ेगा तो लोग वहां जाएंगे लेकिन रहेंगे कैसे! हमने ध्&#x200d;यान नहीं दिया कि हमारे स्&#x200d;कूल और कॉलेज में जो पढ़ाया जा रहा है, वह समय से बहुत पुराना और पीछे का है. हमारी दृष्टि केवल ‘गिरमिटिया’ वाली होकर रह गई. इसीलिए हम सब कुछ नौकरी के आसपास बुनते हैं. जिंदगी के नजदीक नहीं! बढ़ता अकेलापन, गहरी उदासी हमारे घोसलों तक चलकर नहीं आई, हमने उसे आने का न्&#x200d;योता दिया.</p>
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