अखिल भारतीय अधिवेशन में विभिन्न प्रांत के विद्यार्थी बोली-भाषा और संस्कृति काे कर रहे आत्मसात

देहरादून : अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के 71वें राष्ट्रीय अधिवेशन में देश के विभिन्न प्रांतों की भाषा-बोली और सांस्कृतिक

 

संगम भारत की विविधता में एकता का संदेश भी दे रहा है। उड़ीसा, बंगाल, केरल, पंजाब, महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश के छात्रों एक-दूसरे को जानने के साथ ही अन्य प्रांतों की बोली-भाषा और संस्कृति को भी आत्मसात कर रहे हैं। उत्तराखंड की भूमि को देवभूमि मानकर सभी छात्र श्रद्धा से अभिभूत भी नजर आ रहे हैं।

 

सम्मेलन में प्रतिभाग कर रहे विभिन्न प्रांतों के छात्र-छात्राओं ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि वे बदरी-केदार के साथ ही हिमालय के भी दर्शन करना चाहते हैं, लेकिन कपाट बंद होने से वे जा नहीं पा रहे हैं। वे हरिद्वार से गंगा जल ले जाने काे लेकर उत्साहित हैं। असल में विद्यार्थी परिषद ने भगवान बिरसा मुंडा नगर की जो साज-सजा की है, वह उत्तराखंड के देव स्थलों पर अधिक केंद्रित है। यहां भगवान बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री के मंदिरों के साथ ही उत्तराखंड पहाड़ी शैली के घर, वाद्य यंत्र समेत अन्य को बेहतर तरीके से सजाया गया है। देवताओं के ढोल, दमाऊ, रणसिंघा, भंकोर और भी कई पौराणिक वस्तुएं सजाई गई है। प्रदर्शनी व अन्य स्थानों पर दोपहर में इन्हें विभिन्न प्रांतों से आए छात्र-छात्राएं इन्हें नजदीक से देख रहे हैं और रात्रि में जो सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, उनमें इनका उपयोग भी देखेने को मिल रहा है। ऐसे में अधिवेशन में आए छात्रों की उत्तराखंड के प्रति उत्सुकता बढ़ती जा रही है और मन बदरी-केदार के साथ ही पहाड़ की परंपरा व रीति-रिवाजों के साथ आकर्षित हो रहा है।

 

छात्रों ने अपने अनुभव साझा किए। अभाविप कर्नाटक के सह प्रमुख अभिषेक अधिवेशन का उत्तराखंड में होना एक सौभाग्य है। उन्होंने उत्तराखंड के विषय में सुना था लेकिन यहां जब उन्होंने यहां की संस्कृति, परंपराओं, रीति-रिवाजों को जाना तो उन्हें आत्मिक सुख प्राप्त हो रहा है। वे कहते हैं कि उन्होंने कुमांऊ का हुड़ा बजते हुए देखा तो वे इस वाद्य यंत्र के कायल हो गए। अभाविप असम प्रांत के उपाध्यक्ष डॉ अतुर बताते हैं कि करीब 40 छात्र अधिवेशन में आए हैं और अधिवेशन स्थल पर पहुंचते ही उन्हें सबसे पहले मंदिर जैसी आकृतियां दिखाई दी। पूछने पर पता चला कि ये आकृतियां बदरीनाथ व केदारनाथ मंदिर की है। उन्होंने बताया कि यह सुनते ही उनके सारे साथी आध्यात्म की धारा में बह गए और सबने अति भावुक होकर मंदिरों का प्रणाम किया। वे कहते हैं हम देवभूमि में है यह हमारे जीवन का सुखद अनुभव है।

 

अरुणाचल प्रदेश राष्ट्रीय कला मंच की राज्य समन्वयक पोनुंग मोदी कहती है कि उत्तराखंड के बारे में सुना था लेकिन आज यहां आकर देवभूमि के बारे में जाना। उनके के लिए जीवन का सबसे बेहतरीन अवसर है। वे कहती हैं कि उत्तराखंडी भोजन उन्हें खूब पसंद आया। इसके अलावा यहां की संस्कृति, वेशभूषा और लोगों का आत्मियता से बातचीत करना उनके मन को

छू गया।

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