नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय ने चोल ताम्रपट्टिकाएं भारत को लौटाने का ऐलान किया

नई दिल्ली : नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय ने करीब 300 वर्षों से अधिक समय से अपने पास सुरक्षित रखी गईं 11वीं सदी की ऐतिहासिक चोल ताम्रपट्टिकाओं को शनिवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उपस्थिति में भारत को लौटाने का ऐलान किया।

 

विश्वविद्यालय ने अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित लेख में कहा कि शनिवार को हेग में प्रधानमंत्री मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री की उपस्थिति में आयोजित औपचारिक समारोह में इन चोल ताम्रपट्टिकाओं को प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद किसी अन्य अवसर पर इन्हें आधिकारिक रूप से भारत को हस्तांतरित किया जाएगा।

 

विश्वविद्यालय ने अपने लेख में कहा कि उसके कार्यकारी बोर्ड ने चोल ताम्रपट्टिकाओं को भारत लौटाने का निर्णय लिया है। यह फैसला नीदरलैंड की राष्ट्रीय ‘औपनिवेशिक संग्रह समिति’ की सिफारिश के बाद लिया गया। समिति ने अपनी जांच में पाया कि ये ऐतिहासिक वस्तुएं औपनिवेशिक काल के दौरान दक्षिण भारत से बिना वास्तविक अधिकारधारकों की सहमति के बाहर ले जाई गई थीं।

 

विश्वविद्यालय के अनुसार भारत सरकार ने वर्ष 2023 की गर्मियों में चोल ताम्रपट्टिकाओं को वापस करने का अनुरोध किया था। इसके बाद विश्वविद्यालय ने स्वतंत्र विशेषज्ञों से इनकी उत्पत्ति और स्वामित्व संबंधी जांच कराई। साथ ही मामले को औपनिवेशिक संग्रह समिति के पास भेजा गया, जिसने अतिरिक्त अध्ययन और पूर्व शोधों की समीक्षा के बाद इन्हें भारत लौटाने की सिफारिश की।

 

लेख में कहा गया कि चोल ताम्रपट्टिकाएं भारत से संबंधित अत्यंत महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अभिलेख हैं। इन तांबे की पट्टिकाओं में नागपट्टिनम स्थित एक बौद्ध विहार और उससे जुड़े मठों को गांवों के राजस्व और भूमि अधिकार देने संबंधी समझौते दर्ज हैं। विश्वविद्यालय के अनुसार अभिलेख संख्या ओआर.1687 वाली एक वस्तु में 21 तांबे की प्लेटें हैं, जो एक कांस्य वलय से जुड़ी हुई हैं। इस वलय पर 11वीं सदी में शासन करने वाले राजेंद्र चोल प्रथम की मुहर लगी हुई है। इनमें पांच प्लेटों पर संस्कृत और 16 प्लेटों पर तमिल भाषा में अभिलेख अंकित हैं। दूसरी वस्तु ओआर.1688 में तीन तांबे की प्लेटें हैं, जो एक अन्य कांस्य वलय से जुड़ी हैं, जिस पर कुलोत्तुंग चोल प्रथम की मुहर अंकित है। इन पर तमिल भाषा में लेख दर्ज हैं।

 

विश्वविद्यालय ने कहा कि ये चोल ताम्रपट्टिकाएं 1862 से उसके पास सुरक्षित हैं और दक्षिण भारत में शाही चार्टर के महत्वपूर्ण स्रोत मानी जाती हैं। ये चोल और श्रीविजय साम्राज्यों के बीच संबंधों पर भी ऐतिहासिक जानकारी प्रदान करती हैं। इन प्लेटों का कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है। इन्हें विश्वविद्यालय पुस्तकालय में शोध और शिक्षण कार्यों के लिए उपलब्ध कराया जाता रहा है तथा प्रदर्शनियों में भी प्रदर्शित किया गया।

 

जांच रिपोर्ट में कहा गया कि 1687 से 1700 के बीच डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने नागपट्टिनम पर कब्जा किया था। इसी दौरान फोर्ट विज्फ सिनेन के निर्माण और तथाकथित ‘चीनी पगोडा’ क्षेत्र के पुनर्विकास के समय खुदाई में ये प्लेट्स मिली थीं। उस समय नागपट्टिनम डच औपनिवेशिक व्यापार नेटवर्क का हिस्सा था और डच ईस्ट इंडिया कंपनी वहां क्षेत्रीय नियंत्रण रखती थी।

 

रिपोर्ट में कहा गया कि प्लेट्स को संभवतः अशांति या सुरक्षा कारणों से जमीन में सावधानीपूर्वक दबाकर रखा गया था। समिति ने माना कि इन्हें उस समय के वास्तविक अधिकारधारकों की अनुमति के बिना क्षेत्र से बाहर ले जाया गया था, इसलिए यह ‘अनैच्छिक स्वामित्व हानि’ का मामला है।

 

विश्वविद्यालय के अनुसार माना जाता है कि फ्लोरेंटियस कैम्पर नामक डच पादरी इन प्लेटों को 1712 के आसपास नीदरलैंड लेकर गया था। बाद में कैम्पर परिवार के वंशजों ने 1862 में इन्हें लीडेन विश्वविद्यालय को दान कर दिया। उस परिवार का संबंध विश्वविद्यालय में पूर्वी भाषाओं के प्रोफेसर हेंड्रिक अरेंट हमेकर से था। लीडेन विश्वविद्यालय के अध्यक्ष ल्यूक सेल्स ने कहा कि समिति की जांच का अनुरोध किया गया था और वह उसकी सिफारिशों का सम्मान करता है। ये वस्तुएं भारत के लिए अत्यंत ऐतिहासिक महत्व रखती हैं और इसी कारण इनका भारत लौटना उचित है।

 

विश्वविद्यालय पुस्तकालय के निदेशक कर्ट डी बेल्डर ने कहा कि चोल ताम्रपट्टिकाएं विश्वविद्यालय के संग्रह की अत्यंत विशिष्ट वस्तुएं रही हैं। पिछले 160 वर्षों में इन्हें शोध, शिक्षण, प्रदर्शनियों और डिजिटल माध्यमों के जरिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए उपलब्ध कराया गया, लेकिन अब उनका भारत लौटना उचित कदम है। चोल ताम्रपट्टिकाएं भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को सौंपी जाएंगी, जो केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन देश की प्रमुख पुरातात्विक संस्था है। यही संस्था आगे तय करेगी कि इन प्लेटों को भारत में कहां प्रदर्शित किया जाएगा।

 

विश्वविद्यालय ने कहा कि प्लेटों के साथ उनसे जुड़े अभिलेख, पत्राचार और अन्य दस्तावेज भी भारत को उपलब्ध कराए जाएंगे। हालांकि शोध और शिक्षण कार्यों के लिए विश्वविद्यालय इनके डिजिटल संस्करण का उपयोग करता रहेगा। विश्वविद्यालय की जांच रिपोर्ट में कहा गया है कि प्लेट्स बिना वास्तविक अधिकारधारकों की सहमति के भारत से बाहर ले जाई गई थीं। इसी आधार पर इन्हें ‘अनैच्छिक स्वामित्व हानि’ मानते हुए भारत को लौटाने का निर्णय लिया गया।

 

उल्लेखनीय है कि चोल ताम्रपट्टिकाएं 11वीं सदी की तांबे की पट्टिकाएं हैं, जिन्हें राजेंद्र चोल प्रथम और राजराजा चोल प्रथम के काल से जुड़ा माना जाता है। इन 21 तांबे की प्लेटों का कुल वजन लगभग 30 किलोग्राम है। ये नागपट्टिनम के पास आनैमंगलम गांव से संबंधित हैं और इनमें एक बौद्ध विहार चूड़ामणिवर्म विहार को गांवों की जमीन तथा राजस्व देने संबंधी शाही चार्टर दर्ज हैं। साल 1687 से 1700 के बीच डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने नागपट्टिनम पर कब्जे के दौरान फोर्ट विज्फ सिनेन का निर्माण और तथाकथित ‘चीनी पगोडा’ क्षेत्र का पुनर्विकास किया था। इसी दौरान खुदाई में ये प्लेट्स मिली थीं। बाद में फ्लोरेंटियस कैम्पर नामक डच पादरी इन्हें 1703 से 1712 के बीच भारत से नीदरलैंड ले गया। इसके बाद 1862 में कैम्पर परिवार से जुड़े हेंड्रिक अरेंट हमेकर के उत्तराधिकारियों ने इन्हें लीडेन विश्वविद्यालय को दान कर दिया था।

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