श्रीनगर : जम्मू-कश्मीर में अमन-चैन को पटरी से उतारने के लिए सीमा पार बैठे आकाओं ने एक बार फिर खौफनाक पैंतरा बदला है। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने एक बेहद संवेदनशील इनपुट जारी करते हुए अलर्ट किया है कि घाटी में अपनी ज़मीन खो चुके दो पुराने आतंकी संगठन ‘अल-बद्र’ और ‘हिजबुल मुजाहिदीन’ अब एक साथ मिलकर संयुक्त वापसी (जॉइंट री-एंट्री) की फिराक में हैं। खुफिया रिपोर्टों के मुताबिक, पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) कश्मीर में ‘होमग्रोन टेरर मॉडल’ (घरेलू आतंकवाद) को दोबारा खड़ा करने के लिए इन दोनों संगठनों का इस्तेमाल करने की नई रणनीति पर काम कर रही है।
कमांडर हमजा बुरहान की मौत के बाद भी अलर्ट पर एजेंसियां
खुफिया सूत्रों के अनुसार, हाल ही में पाकिस्तान में अल-बद्र के शीर्ष कमांडर हमजा बुरहान की मौत हुई है, जिसे संगठन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा था। बुरहान घाटी के स्थानीय युवाओं को बहला-फुसलाकर कट्टरपंथ की ओर धकेलने और पोस्टर वॉर के जरिए नए कैडरों की भर्ती का जिम्मा संभाल रहा था। इन पोस्टरों में अनुच्छेद 370 के खात्मे और युवाओं के साथ कथित अन्याय जैसे मुद्दों को उछालने का ब्लूप्रिंट तैयार किया गया था। बुरहान की मौत के बावजूद भारतीय एजेंसियों का स्पष्ट मानना है कि इस नेटवर्क को कमजोर आंकना एक गंभीर भूल साबित हो सकती है।
‘लोकल फेस’ के जरिए दुनिया की आँखों में धूल झोंकने की तैयारी में ISI
खुफिया अधिकारियों का विश्लेषण है कि आईएसआई के लिए लश्कर या जैश जैसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंधित संगठनों के बजाय हिजबुल और अल-बद्र के गठजोड़ को आगे बढ़ाना रणनीतिक रूप से अधिक मुफीद है। ऐसा इसलिए क्योंकि इन दोनों को ‘लोकल’ या घरेलू आतंकी चेहरे के रूप में वैश्विक मंचों पर पेश किया जा सकता है। इस नेटवर्क में बड़ी संख्या उन कश्मीरी युवाओं की है जो सालों पहले उच्च शिक्षा या बिजनेस के बहाने वैध वीजा पर पाकिस्तान गए थे, लेकिन वहां आईएसआई ने उनका ब्रेनवॉश कर उन्हें हथियारों की ट्रेनिंग दी और अब उन्हें स्लीपर सेल के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
जैश और लश्कर के असंतुष्ट आतंकियों को जोड़ने की कवायद
एक वरिष्ठ सुरक्षा अधिकारी ने बताया कि अल-बद्र इस समय अकेले कोई बड़ा हमला करने की स्थिति में नहीं है, क्योंकि सुरक्षाबलों की कड़ाई के चलते उसके पास न तो पर्याप्त लड़ाके बचे हैं और न ही पुराना लॉजिस्टिक सपोर्ट। लेकिन स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखने वाले हिजबुल मुजाहिदीन का साथ मिलने से उसे दोबारा पैर जमाने की संजीवनी मिल सकती है। हालिया इंटरसेप्ट्स से पता चला है कि ये दोनों संगठन अब जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा के उन आतंकियों को अपने पाले में खींचने की कोशिश कर रहे हैं जो अपने नेतृत्व से असंतुष्ट हैं।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ से टूटी कमर, वर्चस्व की जंग का भी खतरा
सुरक्षा एजेंसियों के मुताबिक, हाल के महीनों में भारतीय सेना और सुरक्षाबलों द्वारा चलाए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के कारण जैश और लश्कर को भारी जान-माल का नुकसान उठाना पड़ा है। इसी खालीपन का फायदा उठाकर हिजबुल और अल-बद्र खुद को मजबूत करना चाहते हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि इस कोशिश से अलग-अलग आतंकी गुटों के बीच आपसी वर्चस्व और फंडिंग को लेकर खूनी गैंगवार छिड़ सकती है, लेकिन फिलहाल आईएसआई का एकमात्र एजेंडा किसी भी तरह घाटी में अशांति फैलाना है।
हाल ही में पाकिस्तान में हुए हमजा बुरहान के जनाजे में अल-बद्र प्रमुख जमीन बख्त और हिजबुल सुप्रीम कमांडर सैयद सलाहुद्दीन की एक साथ मौजूदगी ने इस नापाक कड़ियों को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है। सुरक्षाबल इस नई चुनौती से निपटने के लिए पूरी तरह मुस्तैद हैं।
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