बेंगलुरु। कर्नाटक की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। कांग्रेस नेता डी.के. शिवकुमार ने आज कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई।
शपथ ग्रहण समारोह राजधानी बेंगलुरु में आयोजित किया गया, जहां कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता और समर्थक मौजूद रहे। इस मौके को पार्टी दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक ताकत के प्रदर्शन के रूप में भी देख रही है।
लंबी राजनीतिक जद्दोजहद के बाद मिली कमान
डीके शिवकुमार का यह शपथ ग्रहण केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे उनकी लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक मेहनत और संगठन में उनकी भूमिका का परिणाम बताया जा रहा है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर अंदरूनी चर्चा और खींचतान जारी थी।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर कई स्तरों पर विचार-विमर्श चलता रहा, जिसमें सत्ता संतुलन और संगठनात्मक रणनीति प्रमुख मुद्दे रहे।
डिप्टी सीएम और कैबिनेट गठन पर सस्पेंस
सूत्रों के अनुसार, नई सरकार में 13 से 15 मंत्रियों के शपथ लेने की संभावना है। हालांकि उपमुख्यमंत्री पद को लेकर अभी अंतिम निर्णय स्पष्ट नहीं हुआ है।
पार्टी के भीतर दो या तीन डिप्टी सीएम बनाए जाने की चर्चा भी सामने आई है, लेकिन इस पर आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। कैबिनेट गठन में जातीय और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखे जाने की बात कही जा रही है।
कांग्रेस के भीतर संतुलन की कोशिश
कांग्रेस नेतृत्व का फोकस नई सरकार में सामाजिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखने पर है। पार्टी चाहती है कि दलित, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिले, ताकि सरकार की स्थिरता और स्वीकार्यता बनी रहे।
सूत्रों के मुताबिक, नेतृत्व परिवर्तन के बाद संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश की जा रही है, ताकि किसी तरह की समानांतर सत्ता की स्थिति न बने।
सिद्धारमैया की भूमिका पर चर्चा
पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की भूमिका को लेकर भी राजनीतिक हलकों में चर्चा जारी है। उन्हें पार्टी में एक महत्वपूर्ण संगठनात्मक भूमिका देने की बात सामने आ रही है, ताकि अनुभव और नेतृत्व का संतुलन बना रहे।
खड़गे की रणनीतिक भूमिका
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे द्वारा संगठनात्मक स्तर पर संतुलन बनाए रखने के प्रयासों को अहम माना जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि नई सरकार को स्थिर और प्रभावी बनाने के लिए सभी गुटों को साथ लेकर चलना जरूरी है।
राजनीतिक संदेश और आगे की राह
विश्लेषकों का मानना है कि यह बदलाव केवल सत्ता हस्तांतरण नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर नए शक्ति संतुलन की शुरुआत है। अब नजर इस बात पर होगी कि नई सरकार कितनी जल्दी अपनी कैबिनेट का गठन करती है और क्या पार्टी अंदरूनी मतभेदों को नियंत्रित कर पाती है या नहीं।
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