West Bengal : पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद क्षेत्रीय क्षत्रपों की ताकत का सबसे मजबूत किला ढहने के बाद अब कांग्रेस से अलग होकर बनी प्रादेशिक पार्टियों के विलय और पुराने दिग्गज नेताओं की घर वापसी का प्लान शीर्ष स्तर पर गंभीरता से शुरू हो चुका है।
इस पूरे राजनीतिक समीकरण में सबसे बड़ा धमाका पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की प्रमुख ममता बनर्जी को लेकर हो रहा है। सूत्रों के हवाले से खबर है कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने ममता बनर्जी को अपनी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, का कांग्रेस में पूर्ण विलय करने का बड़ा प्रस्ताव दिया है।
देश की राजनीति में इसे चाहे संयोग कहें या रणनीति का बड़ा कदम, दिल्ली में एक महत्वपूर्ण विपक्षी बैठक होनी है, जिसमें ममता बनर्जी भी हिस्सा ले रही हैं। यह बैठक ‘इंडिया ब्लॉक’ के नाम से जाने जाने वाले विपक्षी गठबंधन की अहम मीटिंग है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहली बार होगा जब ममता बनर्जी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के साथ सीधे संवाद करेंगी। इस मुलाकात में पर्दे के पीछे चल रही महा-विलय की पटकथा को अंतिम रूप देने की संभावनाएं जताई जा रही हैं, ताकि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक समीकरणों को मजबूत कर सकें।
वर्तमान समय में तृणमूल कांग्रेस गंभीर राजनीतिक दबाव में आ गई है। पश्चिम बंगाल में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी का वर्चस्व और संगठनात्मक ढांचा कमजोर हो चुका है। पार्टी के अंदर आंतरिक असंतोष और विखराव का माहौल साफ दिखाई दे रहा है। यहाँ तक कि पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता अभिषेक बनर्जी पर भी हमले की घटनाएं हो चुकी हैं, जिससे पार्टी के सुरक्षा और स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
पश्चिम बंगाल में सत्ता के संरक्षण के खत्म होने के साथ ही टीएमसी में भारी भगदड़ और बिखराव की स्थिति पैदा हो गई है। पार्टी के भीतर एक बड़ा आंतरिक विद्रोह उभर कर सामने आया है, जिसमें 58 से अधिक विधायकों ने अलग रुख अपना लिया है और अपने अलग नेता चुन लिया है। अभिषेक बनर्जी और उनके नेताओं के खिलाफ लंबे समय से चल रहा असंतोष अब खुलकर सामने आ चुका है। कई सांसद, विधायक और जमीनी नेता अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए सीधे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व से संपर्क कर रहे हैं।
इस समय पार्टी के अंदर चल रहे संकट और बिखराव को देखते हुए ममता बनर्जी भी समझ चुकी हैं कि केंद्रीय सत्ता और बीजेपी के बढ़ते प्रभाव के सामने अकेले रहना अत्यंत कठिन हो गया है। ऐसे में, कांग्रेस से मिलकर संभवत: अपने अस्तित्व को बचाने का यह आखिरी विकल्प हो सकता है। यदि यह विलय सच में होता है, तो देश की राजनीति में यह इस दशक का सबसे बड़ा राजनीतिक उलटफेर साबित होगा। यह कदम न केवल बंगाल बल्कि पूरे देश के राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है।
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