मीनाक्षी नटराजन को सुप्रीम कोर्ट का तगड़ा झटका : चुनावी प्रक्रिया में न्यायिक दखल से साफ इनकार, याचिका खारिज!

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस नेता मीनाक्षी नटराजन की याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने चुनाव प्रक्रिया में दखल देने की मांग की थी। शुक्रवार को सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद, अदालतें इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं।

 

न्यायालय ने कहा कि चुनाव की प्रक्रिया के इस चरण में सुप्रीम कोर्ट की सीमा तय है और वह इस समय कोई भी फैसला नहीं ले सकता। इस फैसले को नटराजन के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि इससे चुनावी प्रक्रिया जारी रखने का रास्ता साफ हो गया है।

 

क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उसने सभी दलीलें सुनी हैं। याचिका में बताया गया था कि रिटर्निंग ऑफिसर (RO) ने आदेश दिया है कि नटराजन ने अपना फॉर्म अधूरा भरा है और अपने खिलाफ चल रहे शिकायत मामले की जानकारी नहीं दी है। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिका दायर करने वाली ने मामले में लिखित दलीलें पेश की थीं, इसलिए उन्हें पूरी जानकारी थी।

 

याचिका में कहा गया था कि नटराजन ने ECI के समक्ष शिकायत की थी कि उनके फॉर्म में गलती है, और उन्होंने 10 जून को व्यक्तिगत रूप से ईसीआई के सामने अपनी दलीलें भी पेश की हैं। फिर भी, ईसीआई ने कोई आदेश नहीं दिया। याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि संविधान के अनुच्छेद 329b के तहत चुनाव प्रक्रिया को रोकने का कोई प्रावधान नहीं है, क्योंकि वह निष्पक्षता और पारदर्शिता से चुनाव कराना चाहती हैं।

 

याचिका में कहा गया कि उनका मकसद चुनाव में बाधा डालना नहीं है। इसमें चुनावी कानून RP एक्ट की धारा 33A का भी जिक्र किया गया, जिसके तहत ऐसी लंबित शिकायतों की जानकारी देना जरूरी है जिनमें दो साल से अधिक सजा का प्रावधान हो और आरोप तय हो चुके हों। यह भी कहा गया कि फिलहाल, आरोप तय नहीं हुए हैं और मामले का संज्ञान भी नहीं लिया गया है, इसलिए नामांकन रद्द करना अवैध और मनमाना है।

 

सुनवाई में, सुप्रीम कोर्ट ने एम. एस. गिल (1975) और अशोक कुमार (2004) के मामलों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि चुनाव से जुड़े विवादों को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, जब तक कि याचिका का मकसद चुनाव में बाधा डालना न हो।

 

ECI का पक्ष:

इस मामले में, वरिष्ठ वकील दामा शेषाद्री नायडू, मुकुल रोहतगी और मध्य प्रदेश सरकार के प्रतिनिधि तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत ऐसी याचिकाएं दायर नहीं की जा सकतीं, क्योंकि किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ है।

 

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जब किसी उम्मीदवार का नामांकन किसी भी आधार पर रद्द किया जाता है, तो उसके खिलाफ चुनाव याचिका ही एकमात्र उपाय है। साथ ही, यह भी कहा गया कि अनुच्छेद 226 और 32 के तहत इस तरह के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट में विचार नहीं किया जा सकता।

क्या है मामला?

मामला मध्य प्रदेश में राज्यसभा चुनाव से जुड़ा है। यहां कांग्रेस की उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन का नामांकन जांच के दौरान खारिज कर दिया गया था। नामांकन रद्द होने के पीछे आरोप था कि उन्होंने अपने हलफनामे में एक आपराधिक मामले का जिक्र नहीं किया था। बीजेपी ने दावा किया कि नटराजन ने तेलंगाना में अपने खिलाफ दर्ज एक अदालती शिकायत का पता नहीं बताया।

 

आरोप था कि उन्होंने अपने हलफनामे में एक अदालत में दर्ज शिकायत का जिक्र नहीं किया, जिससे उनका नामांकन अधूरा माना गया और रद्द कर दिया गया। बीजेपी उम्मीदवार महेश केवट ने इसकी शिकायत चुनाव अधिकारी के पास दर्ज कराई थी।

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