राष्ट्र सेवा और गणतंत्र की सार्थकता के लिए पंच प्रण का संकल्प आवश्यक : स्वामी रामदेव

हरिद्वार : योगगुरू स्वामी रामदेव ने 77वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर स्वदेशी शिक्षा, स्वदेशी चिकित्सा, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, स्वदेशी सनातन जीवन पद्धति तथा स्वदेशी से स्वावलम्बी विकसित भारत- पंच प्रण लेने की बात कही। उन्होंने कहा कि यह पंच संकल्प राष्ट्र सेवा और गणतंत्र की सार्थकता के लिए समय की आवश्यकता है।

 

स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण ने सोमवार को गणतंत्र दिवस पर पतंजलि योगपीठ में तिरंगा फहराया। इस अवसर पर आयोजित समारोह में स्वामी रामदेव ने कहा कि कहीं टैरिफ वार चल रहा है, कहीं सत्ता का उन्माद, कहीं मजहबी उन्माद और भारत में तो सनातनधर्मियों में ही एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप करके गौमाता, गंगा व पालकी के नाम पर उन्माद फैलाने की बात की जा रही है। ऐसे में हमें एक भारत, श्रेष्ठ भारत, स्वस्थ, समृद्ध, संगठित भारत बनाना है तो स्वदेशी शिक्षा, स्वदेशी चिकित्सा, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, स्वदेशी सनातन जीवन पद्धति और अपनी सनातनी विरासत को सर्वोपरि गौरव और महिमा देते हुए एक साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है। तभी हम भारत को दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति, सबसे बड़ी सैन्य शक्ति, सबसे बड़ी राजनीतिक सामाजिक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में विकसित कर पाएंगे।

 

रामदेव ने कहा कि हमें इस गणतंत्र दिवस पर स्वधर्म का संकल्प लेकर अपने दुश्मन देशों, भारत विरोधी और सनातन विरोधी ताकतों को मुंहतोड़ जवाब देने के लिए एकजुट होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि साधु-संतों में कोई झगड़ा न हो, न ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र के नाम पर कोई उन्माद हो, न किसी प्रकार का कोई प्रांतवाद हो, न भाषावाद का उन्माद हो। हम सब एक ऋषियों की, एक पूर्वजों की, एक वीर-वीरांगनाओं की संतान हैं, एक धरती माता, भारत माता की संतान हैं। इस संकल्प के साथ हम आगे बढ़ेंगे तो भारत पूरी दुनिया का मुकाबला कर पाएगा। यदि हिंदुस्तान से पूरी दुनिया में हिंदू, हिंदुत्व और सनातन को सुरक्षित करना है, तो वीर भोग्या वसुंधरा का पाठ पढ़ना ही होगा।

 

पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि छोटे उद्देश्यों के लिए जीना मनुष्य जीवन का लक्ष्य नहीं, बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए उन वीर-शहीदों के बताए मार्ग पर चलकर देश में नया सवेरा लाने का संकल्प करें, जिससे यह देश विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठापित हो सके।

 

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