नई दिल्ली : मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) डॉ. वी. अनंत नागेश्वरन ने गुरुवार को कहा कि हाल के वर्षों में भारत की आर्थिक वृद्धि को और अधिक गति एवं मजबूती मिली है। आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार कोविड-पूर्व अवधि में औसतन 6.4 प्रतिशत रही वास्तविक जीडीपी वृद्धि वित्त वर्ष 2025 में 6.5 प्रतिशत तक पहुंची और वित्त वर्ष 2026 में इसके 7.4 प्रतिशत तक जाने का अनुमान है। उन्होंने बताया कि यह वृद्धि मजबूत घरेलू मांग, निवेश में तेजी और अनुकूल आर्थिक वातावरण का परिणाम है।
संसद में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश होने के बाद राष्ट्रीय मीडिया केंद्र में आयोजित पत्रकार वार्ता में डॉ. नागेश्वरन ने जोर देकर कहा कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत के लिए कृषि, विनिर्माण और सेवा तीन आर्थिक इंजन एक साथ सक्रिय रहना आवश्यक है। विनिर्माण और निर्यात को भविष्य की वृद्धि का आधार बताते हुए उन्होंने कहा कि खंडित और तनावपूर्ण वैश्विक माहौल में यही क्षेत्र भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को मजबूत करेंगे।
नागेश्वरन ने कहा, “वैश्विक अनिश्चितताओं और आर्थिक उथल-पुथल के बीच भारत मैक्रो-स्थिरता का एक ‘ओएसिस’ बना हुआ है।”
उन्होंन कहा कि जब वैश्विक व्यापार पारस्परिक न रह जाए और बाजार तटस्थ न हों, तब ‘स्वदेशी’ एक वैध नीतिगत साधन बन जाता है, जिसे राष्ट्रीय हित में अपनाया जा सकता है।
मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की जीडीपी वृद्धि दर 6.8 से 7.2 प्रतिशत के बीच रहने का अनुमान है। यह चालू वित्त वर्ष के अनुमानित 7.4 प्रतिशत की तुलना में कुछ धीमी है, लेकिन वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए इसे संतुलित और टिकाऊ माना जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आर्थिक वृद्धि को घरेलू कारक मजबूती प्रदान कर रहे हैं। निजी अंतिम उपभोग व्यय की वृद्धि वित्त वर्ष 25 में 7.2 प्रतिशत रही और वित्त वर्ष 26 में इसके लगभग 7 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वहीं, सकल स्थिर पूंजी निर्माण में भी उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला है। यह पूंजी निर्माण में निरंतरता और निवेशकों के बढ़ते विश्वास को दर्शाता है।
सीईए के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था बेहद संतुलित महंगाई के साथ उच्च वृद्धि दर हासिल कर रही है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई वित्त वर्ष 23 में 6.7 प्रतिशत से घटकर वित्त वर्ष 25 में 4.7 प्रतिशत और वित्त वर्ष 26 में (दिसंबर तक) लगभग 1.7 प्रतिशत पर आ गई। खाद्य कीमतों में नरमी और नियंत्रित कोर महंगाई (2.9 प्रतिशत) ने मूल्य स्थिरता को सुनिश्चित किया है, जो मौद्रिक नीति के लिए भी अनुकूल संकेत है।
डॉ. नागेश्वरन ने राज्यों और केंद्र दोनों के लिए राजकोषीय अनुशासन के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहा कि संप्रभु उधारी लागत (कर्ज ब्याज) को किफायती बनाए रखने के लिए वित्तीय अनुशासन आवश्यक है। वित्त वर्ष 21 में 9.2 प्रतिशत के शिखर पर पहुंचा राजकोषीय घाटा वित्त वर्ष 24 में घटकर 5.5 प्रतिशत हुआ और वित्त वर्ष 26 में इसके 4.4 प्रतिशत तक सिमटने का लक्ष्य है। प्राथमिक घाटे में भी लगातार कमी आई है।
उन्होंने कहा कि राजस्व पक्ष पर प्रत्यक्ष कर आधार के विस्तार से सरकार की आय मजबूत हुई है। आयकरदाताओं की संख्या वित्त वर्ष 22 में 6.9 करोड़ से बढ़कर वित्त वर्ष 25 में 9.2 करोड़ हो गई है। साथ ही, सरकार ने पूंजीगत व्यय पर विशेष जोर दिया है। प्रभावी पूंजीगत व्यय जीडीपी के 2.7 प्रतिशत से बढ़कर 3.9 प्रतिशत तक पहुंच गया है, जो दीर्घकालिक वृद्धि के लिए सकारात्मक संकेत है।
उन्होंने कहा कि भारत में डिजिटल बुनियादी ढांचे का भी तेजी से विस्तार हुआ है। ब्रॉडबैंड उपभोक्ताओं की संख्या 2014 के 6 करोड़ से बढ़कर 2025 में 100 करोड़ तक पहुंच गई है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) में भी निरंतर वृद्धि दर्ज की गई है, जो वैश्विक निवेशकों के भारत पर बढ़ते भरोसे को दर्शाती है।
उन्होंने बताया कि उच्च-गति राजमार्ग कॉरिडोरों की परिचालन लंबाई 550 किलोमीटर से बढ़कर 5,360 किलोमीटर हो गई है। रेल क्षेत्र में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है, जहां रेलवे नेटवर्क का कमीशनिंग 1,500 किलोमीटर से बढ़कर 3,100 किलोमीटर से अधिक हो गया है। इसी तरह, बंदरगाह अवसंरचना में कार्गो हैंडलिंग और कुल क्षमता दोनों में बड़ा विस्तार दर्ज किया गया है।
डॉ. नागेश्वरन ने बताया कि बेरोजगारी दर 6 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 3.2 प्रतिशत रह गई है। महिला श्रम-बल भागीदारी में लगभग 18 प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई है। पहले नौ महीनों में बेरोजगारी दर 5.4 प्रतिशत से घटकर 4.9 प्रतिशत हो गई है। साथ ही, पीएलएफएस सर्वे अब जुलाई-जून चक्र से हटकर कैलेंडर-वर्ष आधारित किया जा रहा है, इसलिए 2025 के आंकड़े मार्च में जारी होंगे।
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