बंगलुरु : सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने रविवार को कहा कि विकसित भारत का सपना केवल इमारतों, तकनीकी प्रगति या नारों से पूरा नहीं होगा। बंगलुरु में सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के पहले राष्ट्रीय सम्मेलन में उन्होंने चेताया कि असहमति की आवाजों को दबाना और अंधाधुंध गिरफ्तारियां लोकतंत्र और विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा हैं।
UAPA के दुरुपयोग पर गंभीर सवाल
जस्टिस भुइयां ने आतंकवाद विरोधी कानून (UAPA) के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि 2019 से 2023 तक हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया, लेकिन सजा की दर केवल 5 प्रतिशत रही। उन्होंने कहा, “इतनी कम सजा दर यह दर्शाती है कि यह कानून अक्सर दुरुपयोग में जा रहा है।”
उन्होंने आगे कहा कि बिना पर्याप्त सबूत के की गई गिरफ्तारी न केवल न्यायिक प्रणाली पर बोझ डालती है, बल्कि नागरिकों की मौलिक स्वतंत्रता का भी हनन करती है। जस्टिस भुइयां ने जोर देकर कहा कि एक विकसित लोकतंत्र में आलोचना और असहमति के लिए जगह होना जरूरी है, इसे अपराध नहीं माना जाना चाहिए।
न्यायपालिका में ‘कांच की दीवार’
जस्टिस भुइयां ने न्यायपालिका में महिलाओं की कम भागीदारी पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि जिला अदालतों में 50 प्रतिशत से अधिक महिलाएं न्यायिक अधिकारी बन रही हैं, लेकिन हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में महिलाओं का प्रतिशत लगभग नगण्य है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में केवल 11 महिलाएं जज रही हैं, जबकि कुल 287 जजों में पुरुषों का दबदबा रहा।
उन्होंने कोलेजियम सिस्टम पर भी चिंता जताई और कहा कि जब तक चयन प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ नहीं होगी, महिलाएं इस ‘कांच की दीवार’ को तोड़ नहीं पाएंगी।
विकसित भारत का सही मापदंड
जस्टिस भुइयां ने यह भी स्पष्ट किया कि विकास का मतलब केवल ऊंची इमारतें और आर्थिक प्रगति नहीं, बल्कि समाज में सभी वर्गों के प्रति सम्मान और समानता होना है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस समाज में एक बच्चा दलित महिला के हाथ का बना खाना खाने से इनकार करता है, वह समाज विकसित नहीं कहलाएगा।
उन्होंने कहा कि 2047 तक विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब न्याय, समानता और नागरिक स्वतंत्रता के मूल्य सुनिश्चित हों।
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