एकात्म मानव दर्शन भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन: थावरचंद गहलोत

मैसूर : कर्नाटक के राज्यपाल थावर चंद गहलोत ने बुधवार को कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का ‘एकात्म मानव दर्शन’ केवल एक दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, विचार और जीवन शैली की मूल आधारशिला है। उन्होंने इसे भारतीय संस्कृति का जीवन दर्शन बताते हुए कहा कि यह विचारधारा व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच समन्वय स्थापित करने का मार्ग दिखाती है।

 

राज्यपाल मैसूर स्थित कर्नाटक राज्य मुक्त विश्वविद्यालय में प्रज्ञा प्रवाह कर्नाटक द्वारा आयोजित ‘एकात्म मानव दर्शन: भारत का विश्वदृष्टिकोण’ विषयक संगोष्ठी को संबोधित कर रहे थे।

 

राज्यपाल ने अपने संबोधन में कहा कि भारत अपनी प्राचीन सभ्यता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के कारण विश्व में विशिष्ट स्थान रखता है। अनेक महान व्यक्तित्वों ने इस विरासत को सहेजा और समाज के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान किए। उन्होंने बताया कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लगभग 60 वर्ष पूर्व अपने चिंतन के माध्यम से एकात्म मानव दर्शन की अवधारणा प्रस्तुत की, जो व्यक्ति के सर्वांगीण विकास का मार्ग प्रशस्त करती है।

 

उन्होंने कहा कि इस दर्शन का केंद्र मनुष्य है, जो शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा का समन्वित स्वरूप है। यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष जैसे चार पुरुषार्थों के संतुलन पर आधारित है तथा परिवार, समाज और राष्ट्र के बीच एकात्मता स्थापित करता है। उनके अनुसार, समाज एक जीवंत इकाई है, जिसमें सभी वर्गों का समन्वय और सहयोग आवश्यक है।

 

उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कार्यक्रम को वर्चुअल माध्यम से संबोधित करते हुए कहा कि एकात्म मानव दर्शन की 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित यह संगोष्ठी वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है। उन्होंने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय के विचार हमें अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी बोध कराते हैं।

 

उन्होंने ‘विकसित भारत 2047’ की परिकल्पना को इसी दर्शन से प्रेरित बताते हुए कहा कि यह केवल आर्थिक या तकनीकी प्रगति तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विकास को भी समाहित करता है।

 

इस अवसर पर विभिन्न विद्वानों और गणमान्य व्यक्तियों ने भी अपने विचार व्यक्त किए।———

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