राज्य सभा में सीएपीएफ विधेयक पर चर्चा, विपक्ष ने कमेटी गठन करने की मांग की

नई दिल्ली : राज्यसभा में सोमवार को केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक पर चर्चा की गई। सत्ता पक्ष के सांसदों ने जहां इस विधेयक को देश की “आंतरिक सुरक्षा की मुख्य रेखा” बताया तो वहीं विपक्ष के नेताओं ने इसे वापस लेने या सेलेक्ट कमेटी को भेजने की मांग की। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह, सपा सांसद रामगोपाल यादव और कांग्रेस सांसद दिग्विजय सिंह ने बिल का विरोध करते हुए इसे जनविरोधी और अर्धसैनिक बल विरोधी बताया है।

 

भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल को देश की “आंतरिक सुरक्षा की मुख्य रेखा” बताया। उन्होंने कहा कि सीमा सुरक्षा बल जहां सीमाओं की पहली सुरक्षा पंक्ति है, वहीं पुलिस कानून-व्यवस्था संभालती है और सीएपीएफ सीमा के साथ-साथ देश के भीतर भी सुरक्षा सुनिश्चित करती है। उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी सरकार इन बलों के हितों की रक्षा के लिए पूरी मजबूती से काम कर रही है। राजनाथ सिंह के रक्षा मंत्री रहते दुश्मनों की गोलीबारी का जवाब देने की नीति अपनाई गई। सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि पिछले 10 वर्षों में सीमापार गोलीबारी की घटनाएं कम हुई हैं, सिवाय ऑपरेशन सिंदूर के। उन्होंने इस विधेयक को सुव्यवस्थित और प्रभावी बताया।

 

सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि जब सीएपीएफ माओवाद के खिलाफ लड़ रहा था, तब कांग्रेस सरकार की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सुपर कैबिनेट ने खुले तौर पर माओवादियों का समर्थन किया और सीएपीएफ की आलोचना की।

 

उनका कहना है कि जब पी. चिदंबरम भारत के गृह मंत्री थे, तब उन्होंने माओवादियों से अपनी विचारधारा न छोड़ने बल्कि बातचीत के लिए आने को कहा था। वर्तमान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने माओवादियों से अपनी विचारधारा और अपने स्वार्थों को छोड़कर सच्चाई के सामने आने का आग्रह किया है।

 

आरजेडी के सांसद प्रोफेसर मनोज कुमार झा ने कहा कि हर एक विधेयक का एक निर्धारित क्षेत्र होता है; उस क्षेत्र का अतिक्रमण करना सही नहीं है, इससे (सीएपीएफ अधिकारियों को) “द्वितीय श्रेणी के नागरिक होने का अहसास” होगा।

 

आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने विधेयक पर चर्चा में भाग लेते हुए केन्द्र सरकार पर सुरक्षा बलों के साथ “अन्याय” करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि जो जवान देश की सीमाओं की रक्षा करते हैं, उनके आत्महत्या जैसे मामलों पर सरकार चुप है। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार सैनिक जरूरत के समय अपने घर भी नहीं जा पाते।

 

उन्होंने आगे कहा कि मुरली मनोहर जोशी और पी चिदांबरम की रिपोर्ट्स में भी सुझाव दिया गया है कि सीआरपीएफ के अधिकारियों को आईपीएस अधिकारियों की तरह पदोन्नति मिलनी चाहिए।

 

दिग्विजय सिंह ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि सरकार हमारे देश की रक्षा करने वाले सशस्त्र बलों को निराश कर रही है। उनका कहना है कि यह विधेयक केवल प्रशासनिक विधेयक नहीं है, बल्कि यह सीएपीएफ अधिकारियों द्वारा सामना किए जाने वाले भेदभाव को संस्थागत रूप देगा। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्देशित कोई कैडर समीक्षा नहीं की गई, कैडर अधिकारियों को कोई अवसर नहीं दिया गया।

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