अगरतला : पूर्वोत्तर राज्य त्रिपुरा में अवैध घुसपैठ का मुद्दा अब कानूनी गलियारों में गर्मा गया है। त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने सीमा पार से हो रही घुसपैठ को रोकने में राज्य सरकार की सुस्ती पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया है कि पिछले कुछ समय में घुसपैठियों का पता लगाने, उन्हें हिरासत में लेने और वापस भेजने (निर्वासन) के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी विस्तृत रिपोर्ट अगले तीन महीने के भीतर पेश की जाए।
गृह मंत्रालय के नियमों की अनदेखी का आरोप
मुख्य न्यायाधीश एमएस रामचंद्र राव की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने यह निर्देश ‘टिपरा मोथा पार्टी’ के विधायक रंजीत देबबर्मा सहित तीन अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ताओं का सीधा आरोप है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा घुसपैठ रोकने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाने के बावजूद, त्रिपुरा सरकार इस गंभीर समस्या के समाधान के लिए प्रभावी कदम उठाने में विफल रही है।
“दुनिया देख रही, पर सरकार चुप”: विधायक रंजीत देबबर्मा
अदालत के बाहर मीडिया से बात करते हुए विधायक रंजीत देबबर्मा ने अपनी नाराजगी जाहिर की। उन्होंने कहा, “मैंने इस मुद्दे को कई बार अलग-अलग मंचों पर उठाया, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस जवाब नहीं मिला। जब अन्य राज्य अवैध प्रवासियों की पहचान के लिए सक्रिय अभियान चला रहे हैं, तो त्रिपुरा सरकार पीछे क्यों है? राज्य की आंतरिक सुरक्षा के लिए घुसपैठ को तुरंत रोका जाना अनिवार्य है।” उन्होंने उम्मीद जताई कि अब अदालत के हस्तक्षेप से इस मामले में तेजी आएगी।
856 किमी लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा की चुनौती
त्रिपुरा की भौगोलिक स्थिति घुसपैठ की समस्या को और जटिल बना देती है। राज्य बांग्लादेश के साथ 856 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमा साझा करता है। हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, लगभग 85 प्रतिशत सीमा पर बाड़ (Fencing) लगाई जा चुकी है, लेकिन नदी तटीय क्षेत्रों और दुर्गम इलाकों में अब भी सेंधमारी की खबरें आती रहती हैं। याचिकाकर्ताओं के वकील एंथोनी देबबर्मा ने बताया कि कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अगले 90 दिनों के भीतर की गई कार्रवाई का पूरा ब्योरा मांगा है।
क्या होगा अगला कदम?
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद अब राज्य प्रशासन और सीमा सुरक्षा बलों के बीच समन्वय बढ़ने की उम्मीद है। गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार अवैध प्रवासियों का डेटा तैयार करना और उनके निर्वासन की प्रक्रिया को तेज करना सरकार के लिए अब एक कानूनी बाध्यता बन गई है। तीन महीने बाद जब रिपोर्ट पेश होगी, तब यह साफ हो पाएगा कि त्रिपुरा सरकार ने इस ‘नासूर’ बन चुकी समस्या के लिए जमीनी स्तर पर क्या काम किया है।
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