पूर्व डीजीपी राजीव कुमार काे ममता ने बनाया राज्यसभा का उम्मीदवार

कोलकाता : पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर पूर्व पुलिस महानिदेशक राजीव कुमार को लेकर चर्चा तेज हो गई है।जिस राजीव कुमार के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के खिलाफ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं, उन्हें ही तृणमूल ने आगामी राज्यसभा चुनाव के लिए अपना उम्मीदवार घोषित किया है। सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद सक्रिय राजनीति में उनकी एंट्री को लेकर सियासी गलियारों में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।

 

पूर्व डीजीपी राजीव कुमार 1989 बैच के पश्चिम बंगाल कैडर के भारतीय पुलिस सेवा अधिकारी रहे हैं। उनका जन्म 31 जनवरी, 1966 को उत्तर प्रदेश के चंदौसी में हुआ था। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की से कंप्यूटर साइंस में अभियांत्रिकी की डिग्री प्राप्त की। उनके दादा प्रोफेसर रामशरण को ‘मुरादाबाद का गांधी’ कहा जाता था।

 

राजीव कुमार को राज्य के तेजतर्रार अधिकारियों में गिना जाता रहा है। उन्होंने दुर्गापुर में प्रभारी के रूप में सेवा शुरू की और बाद में बीरभूम सहित कई जिलों में पुलिस अधीक्षक के पद पर कार्य किया।

 

कोलकाता पुलिस की विशेष कार्यबल (एसटीएफ) के प्रमुख के रूप में उन्होंने उग्रवाद और आतंकवाद विरोधी अभियानों में भूमिका निभाई। वर्ष 2002 में कोलकाता स्थित अमेरिकी केंद्र पर हुए हमले के मुख्य आरोपित आफताब अंसारी की गिरफ्तारी में भी उनकी अहम भूमिका बताई जाती है।

 

वह बिधाननगर और बाद में कोलकाता के पुलिस आयुक्त रहे। इसके अतिरिक्त दो बार पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक पद पर नियुक्त हुए। उन्होंने राज्य सरकार में सूचना प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव तथा अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में भी कार्य किया।

 

राजीव कुमार का नाम कई चर्चित मामलों में सामने आया। वर्ष 2013 में शारदा चिटफंड घोटाले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल के प्रमुख के रूप में उनकी भूमिका विवादों में रही। उन पर आरोप लगा कि जांच के दौरान साक्ष्यों को मिटाया ताकि मुख्य आरोपित पकड़े न जाएं। खासतौर पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनके सहयोगियों को बचाने का आरोप उन पर लगा।

 

फरवरी 2019 में जब सीबीआई की टीम उनसे पूछताछ के लिए कोलकाता स्थित उनके आवास पहुंची, तब कोलकाता पुलिस द्वारा जांच एजेंसी के अधिकारियों को हिरासत में लेने की घटना ने राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया था। इसके विरोध में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी धरने पर बैठ गई थीं।

 

विपक्ष ने उन पर फोन टैपिंग के भी आरोप लगाए। विधानसभा चुनावों के दौरान निर्वाचन आयोग ने उन्हें पद से हटाया था। हाल में प्रवर्तन निदेशालय की एक छापेमारी के दौरान उनके एक कार्यालय पहुंचने को लेकर भी राजनीतिक विवाद हुआ था।

 

तृणमूल कांग्रेस के इस फैसले को सत्तारूढ़ दल के भीतर भरोसेमंद अधिकारी को राजनीतिक जिम्मेदारी देने के रूप में देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहले भी सार्वजनिक मंचों से राजीव कुमार की प्रशंसा कर चुकी हैं।

 

डीजीपी के रूप में राजीव कुमार का कार्यकाल 31 जनवरी, 2026 को समाप्त हुआ। सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद राज्यसभा के लिए उनकी उम्मीदवारी ने स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी भूमिका अब नए अध्याय की ओर बढ़ चुकी है।——————–

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