मप्र की ऐतिहासिक भोजशाला में अब बिना रोक-टोक के 365 दिन होगी पूजा, एएसआई ने जारी किया नया आदेश

भोपाल : मध्य प्रदेश के धार जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक भोजशाला मामले में उच्च न्यायालय के हालिया आदेश के परिप्रेक्ष्य में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा शनिवार को एक नया प्रशासनिक आदेश जारी किया गया है। नए आदेश के मुताबिक भोजशाला में अब बिना किसी रोक-टोक के 365 दिन पूजा होगी।

 

नई व्यवस्था के तहत एएसआई ने पहली बार इस ऐतिहासिक स्थल को प्रशासनिक तौर पर राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला के रूप में संबोधित किया है। इससे पहले इस परिसर के साथ प्रयुक्त होने वाले कमाल मौला मस्जिद संबंधी उल्लेख को स्वीकार नहीं किया गया था।

 

एएसआई ने शनिवार को जारी आदेश में भोजशाला में पूजा-पाठ को लेकर नई व्यवस्था दी है। नई व्यवस्था के तहत एएसआई ने पहली बार इस ऐतिहासिक स्थल को प्रशासनिक तौर पर “राजा भोज द्वारा स्थापित भोजशाला एवं संस्कृत पाठशाला” के रूप में संबोधित किया है। इससे पहले इस परिसर के साथ प्रयुक्त होने वाले कमाल मौला मस्जिद संबंधी उल्लेख को स्वीकार नहीं किया गया था। हिंदू संगठनों और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने इसे ऐतिहासिक और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए ऐतिहासिक सत्य की पुनर्स्थापना कहा है।

 

मुख्य याचिकाकर्ता आशीष गोयल के अनुसार, उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में भोजशाला के ऐतिहासिक स्वरूप और वहां निरंतर चली आ रही हिंदू पूजा परंपरा को विशेष महत्व दिया है। इसके बाद एएसआई द्वारा जारी नए आदेश में हिंदू समाज को वर्ष के सभी 365 दिनों तक बिना किसी रोक-टोक के पूजा-अर्चना करने का अधिकार प्रदान किया गया है। इसके साथ ही, पूर्व में लागू शुक्रवार की नमाज संबंधी व्यवस्था को निरस्त किए जाने की बात भी सामने आई है।

 

क्या थी पुरानी व्यवस्था?

 

दरअसल, वर्ष 2003 से लागू एएसआई की व्यवस्था के अनुसार भोजशाला में सह-अस्तित्व का नियम था, जिसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति थी। शेष दिनों में यह स्थल पर्यटकों के लिए खुला रहता था। इस फैसले और एएसआई की नई व्यवस्था की जानकारी मिलते ही धार सहित पूरे मध्य प्रदेश में श्रद्धालुओं और विभिन्न सामाजिक संगठनों के बीच भारी उत्साह देखा जा रहा है।

 

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल एक धार्मिक स्थल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक पहचान और वैज्ञानिक पुरातात्विक साक्ष्यों (एएसआई सर्वे) के महत्व को भी रेखांकित करता है। यह स्थल लंबे समय से परमार वंश के महान राजा भोज की ज्ञान परंपरा, विद्या के केंद्र और मां सरस्वती (वाग्देवी) के प्राचीन मंदिर के रूप में हिंदू पक्ष की आस्था का केंद्र रहा है, जिसे अब कानूनी और प्रशासनिक मान्यता मिलने का दावा किया जा रहा है।

 

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