युवाओं के लिए भारत की पहली राष्ट्र-कथा कहने वाले संत: सद्गुरु रितेश्वर महाराज

(शाश्वत तिवारी): जब राष्ट्रकथा का सूत्रधार संत बने भारत की संत-परंपरा सदियों से आध्यात्मिक चेतना की वाहक रही है। संतों ने मोक्ष, भक्ति, वैराग्य और आत्मकल्याण की बातें कहीं, पर बहुत कम अवसरों पर संतों ने राष्ट्र को केन्द्रीय विषय बनाकर, विशेषकर युवाओं को लक्ष्य करके, एक समग्र राष्ट्र-कथा प्रस्तुत की हो। इसी ऐतिहासिक रिक्तता को भरते हुए समकालीन भारत में सद्गुरु रितेश्वर महाराज एक ऐसे संत के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने अध्यात्म को राष्ट्रबोध से जोड़ा, और राष्ट्रबोध को युवाशक्ति से।

वे केवल प्रवचनकर्ता नहीं हैं। वे विचार-निर्माता, संस्कृति-संरक्षक और राष्ट्रीय चेतना के आधुनिक कथाकार हैं। आज जब भारत युवा है, ऊर्जावान है, पर वैचारिक द्वंद्व से भी घिरा है, ऐसे समय में सद्गुरु रितेश्वर महाराज की राष्ट्र-कथा केवल प्रेरणा नहीं, बल्कि दिशा बनकर सामने आती है।

भारत में संतों और राष्ट्र का रिश्ता नया नहीं है। गुरु नानक ने सामाजिक समरसता की नींव रखी,
कबीर ने आडंबरों पर प्रहार किया, स्वामी विवेकानंद ने राष्ट्र को ‘युवाओं का धर्म’ कहा,
और श्रीअरविंद ने अध्यात्म को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ा। लेकिन स्वतंत्रता के बाद धीरे-धीरे संतों को केवल “धार्मिक” दायरे में सीमित कर दिया गया। राष्ट्र, राजनीति और समाज को अलग-अलग खानों में बाँट दिया गया।
सद्गुरु रितेश्वर महाराज इस कृत्रिम विभाजन को अस्वीकार करते हैं।
उनकी दृष्टि में, “राष्ट्र कोई भूगोल नहीं, वह एक जीवित चेतना है, और चेतना को जगाने का काम संत ही कर सकता है।”
सद्गुरु रितेश्वर महाराज जिस राष्ट्र-कथा की बात करते हैं, वह केवल इतिहास की घटनाओं का विवरण नहीं है।

यह कथा है: भारत की सभ्यतागत आत्मा की,
भारत के संस्कृति-कोड की,
भारत के कर्तव्य-बोध की,
और भारत के भविष्य-दृष्टि की,
सद्गुरु युवाओं से कहते हैं, “तुम्हें भारत पर गर्व करना सिखाने नहीं आया हूँ,
तुम्हें भारत को जीना सिखाने आया हूँ।”
उनकी राष्ट्र-कथा भावुक राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि बौद्धिक, सांस्कृतिक और नैतिक राष्ट्रबोध है।

आज का भारतीय युवा तकनीक में दक्ष है। वैश्विक है, महत्वाकांक्षी है, लेकिन साथ ही अपनी जड़ों से कटता जा रहा है। इतिहास को बोझ समझता है, संस्कृति को पिछड़ापन मानने लगा है
सद्गुरु रितेश्वर महाराज इस स्थिति को राष्ट्र का सबसे बड़ा संकट नहीं, बल्कि सबसे बड़ी संभावना मानते हैं।
उनके अनुसार, “अगर युवा भटक रहा है, तो दोष युवा का नहीं, कथा के अभाव का है।”
युवा को कोई ऐसी कथा नहीं मिली जिसमें वह स्वयं को देख सके। एक उत्तरदायित्वपूर्ण नागरिक के रूप में, एक साधक के रूप में, एक राष्ट्र-निर्माता के रूप में।

सद्गुरु रितेश्वर महाराज की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे राष्ट्र-कथा को धर्म की संकीर्ण परिभाषा से मुक्त रखते हैं।
वे कहते हैं, राष्ट्रभक्ति का अर्थ नारे नहीं, राष्ट्रधर्म का अर्थ दूसरों से घृणा नहीं संस्कृति का अर्थ अतीत में फँस जाना नहीं।
उनकी कथा में, राम मर्यादा के प्रतीक हैं।
कृष्ण रणनीति और कर्मयोग के अर्जुन युवा भारत के प्रतीक हैं। संशयग्रस्त, पर सक्षम और महाभारत केवल युद्ध नहीं, बल्कि कर्तव्य के चयन की कथा बन जाती है।
सद्गुरु रितेश्वर महाराज की राष्ट्र-कथा की सबसे बड़ी ताकत है, समकालीन संदर्भ हैं।
वे, बेरोज़गारी को धर्म से जोड़ते हैं, शिक्षा को, संस्कार से, राजनीति को नैतिकता से और तकनीक को विवेक से।
वे युवाओं से पूछते हैं, “अगर तुम कोड लिख सकते हो, तो राष्ट्र के लिए आचार क्यों नहीं?”
उनका संदेश सीधा है, आधुनिक बनो, पर आत्मविस्मृत मत हो।
उनके दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण वैचारिक स्पष्टता है, वे राज्य और राष्ट्र में अंतर बताते हैं।
राज्य व्यवस्था है, राष्ट्र भावना है। राज्य बदल सकता है, सरकारें आ-जा सकती हैं। लेकिन राष्ट्र तब तक जीवित रहता है, जब तक उसकी कथा जीवित है, और यही कथा वे युवाओं को सौंपते हैं।
आज का युवा दो ध्रुवों में फँसा है, एक ओर विचारधारात्मक नकारात्मकता, दूसरी ओर उपभोक्तावादी आत्मकेंद्रिता। सद्गुरु रितेश्वर महाराज दोनों के बीच तीसरा मार्ग प्रस्तुत करते है,
“राष्ट्र के बिना व्यक्ति अधूरा है,
और व्यक्ति के बिना राष्ट्र जड़।”
उनकी कथा न तो नकारात्मक है, न उग्र, वह संयमित, विवेकपूर्ण और प्रेरक है।
यदि कहा जाए कि सद्गुरु रितेश्वर महाराज केवल संत हैं, तो यह उनके योगदान को सीमित करना होगा। वे वास्तव में राष्ट्र के कथाकार हैं और युवाओं के मार्गदर्शक हैं। वे प्रश्न उठाते हैं, उत्तर थोपते नहीं। वे चेतना जगाते हैं, आज्ञा नहीं देते।

सद्गुरु रितेश्वर महाराज की राष्ट्र-कथा अतीत में नहीं अटकती। उनकी दृष्टि स्पष्ट रूप से भारत- 2047 पर है। आत्मनिर्भर भारत, सांस्कृतिक रूप से जाग्रत भारत, नैतिक नेतृत्व वाला भारत और इस भारत का निर्माता युवा। वे कहते हैं, “2047 की आज़ादी काग़ज़ की नहीं, चरित्र की आज़ादी होगी।”
आज जब भारत वैश्विक मंच पर खड़ा है, जब युवा संख्या में सबसे अधिक है, जब चुनौतियाँ भी उतनी ही बड़ी हैं। ऐसे समय में सद्गुरु रितेश्वर महाराज का राष्ट्र-कथा कहना, केवल आध्यात्मिक घटना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आवश्यकता है।
वे याद दिलाते हैं कि, राष्ट्र बिना कथा के नहीं चलता और कथा बिना संत के नहीं बचती। युवाओं के लिए भारत की पहली समग्र राष्ट्र-कथा कहने वाले संत के रूप में सद्गुरु रितेश्वर महाराज
न केवल वर्तमान के स्वर हैं, बल्कि भविष्य की पुकार भी।
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(लेखक: स्वतंत्र पत्रकार व सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणीकार हैं)

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