न्यायिक व्यवस्था को अस्पतालों की तरह सेवा भाव से करना होगा काम : मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत

शिमला : भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने कहा है कि न्यायिक परिसरों को अस्पतालों की तरह काम करने की आवश्यकता है, क्योंकि जिस तरह लोग उम्मीद लेकर अस्पताल जाते हैं, उसी तरह लोग अदालतों में भी राहत की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि न्याय व्यवस्था को भी उसी सेवाभाव के साथ काम करना चाहिए, जिससे लोगों को समय पर न्याय मिल सके।

 

मुख्य न्यायाधीश रविवार को हिमाचल प्रदेश के मंडी में आयोजित विधिक साक्षरता शिविर में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे न्यायिक ढांचे में सुविधाएं बढ़ती हैं, वैसे-वैसे न्याय व्यवस्था की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है।

 

उन्होंने कहा कि मंडी को छोटी काशी के नाम से जाना जाता है और यहां लोग श्रद्धा के साथ आते हैं। ऐसे में यहां न्याय के मंदिर के रूप में एक आधुनिक न्यायिक परिसर का निर्माण होना क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने मौलिक अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों के बारे में भी जागरूक होना चाहिए, क्योंकि संविधान में दोनों को समान महत्व दिया गया है।

 

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि हिमाचल प्रदेश ने अपनी प्राकृतिक सुंदरता को अच्छी तरह संभालकर रखा है और यहां के लोगों में संवैधानिक मूल्यों के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि छोटे स्तर पर भी ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे लोगों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जानकारी मिल सके।

 

इससे पहले मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने मंडी में लगभग 152 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाले नए ज्यूडिशियल कोर्ट कॉम्प्लेक्स का शिलान्यास किया। इस दौरान मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू भी मौजूद रहे।

 

यह अत्याधुनिक न्यायिक परिसर करीब 9.6 हेक्टेयर भूमि पर बनाया जाएगा। इसमें चार अलग-अलग ब्लॉक होंगे और जजों, वकीलों तथा आम लोगों के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी।

 

इस अवसर पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने कहा कि प्रदेश सरकार का लक्ष्य है कि हर नागरिक तक न्याय और अधिकारों की पहुंच सुनिश्चित हो। उन्होंने कहा कि सरकार संविधान की भावना के अनुरूप समावेशी विकास और सामाजिक न्याय के लिए काम कर रही है।

 

मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य सरकार ने करीब छह हजार अनाथ बच्चों को ‘चिल्ड्रन ऑफ द स्टेट’ के रूप में अपनाया है और इसके लिए विशेष कानून बनाया गया है। इसके अलावा बेटियों की शादी की आयु बढ़ाकर 21 वर्ष की गई है, ताकि उन्हें समान अवसर मिल सकें। बेटियों को पैतृक संपत्ति में भी बराबर अधिकार देने का प्रावधान किया गया है।

 

उन्होंने कहा कि विधवा महिलाओं के बच्चों की पढ़ाई सुनिश्चित करने के लिए ‘इंदिरा गांधी सुख शिक्षा योजना’ शुरू की गई है, जिसके तहत राज्य सरकार उनकी शिक्षा का खर्च उठा रही है। इसके साथ ही राजस्व लोक अदालतों के माध्यम से करीब साढ़े पांच लाख पुराने मामलों का निपटारा किया गया है।

 

कार्यक्रम में हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह सन्धावालिया ने कहा कि इस तरह के जागरूकता शिविरों का उद्देश्य हर व्यक्ति तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि न्याय केवल अदालतों तक सीमित नहीं होना चाहिए, लोगों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना भी उतना ही जरूरी है।

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