कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट’ को लेकर पर्यावरण मंत्री को पत्र लिखकर, पर्यावरण मंज़ूरी की प्रक्रिया पर उठाए सवाल

नई दिल्ली : कांग्रेस महासचिव (संचार) जयराम रमेश ने ग्रेट निकोबार द्वीप विकास परियोजना को लेकर केंद्र सरकार पर एक बार फिर गंभीर सवाल उठाए हैं। उन्होंने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर आरोप लगाया कि परियोजना को दी गई पर्यावरणीय मंजूरी अधूरी और अपर्याप्त पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्टों के आधार पर प्रदान की गई है।

 

जयराम रमेश का कहना है कि सरकार द्वारा जारी ‘ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट एफएक्यू’ में किए गए कई दावे मंत्रालय के आधिकारिक दस्तावेजों और उपलब्ध अध्ययनों से मेल नहीं खाते।

 

जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपना पत्र साझा करते हुए कहा कि सरकार ने 01 मई को जारी एफएक्यू में दावा किया था कि परियोजना के संभावित पर्यावरणीय प्रभावों की व्यापक पहचान, मूल्यांकन और प्रबंधन मजबूत पर्यावरण प्रभाव आकलन प्रक्रिया तथा विस्तृत पर्यावरण प्रबंधन योजना के माध्यम से किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि वह इस विषय पर पहले भी 03 मई को विस्तृत प्रतिक्रिया दे चुके हैं, लेकिन अब कुछ अतिरिक्त तथ्यों और तकनीकी बिंदुओं की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं।

 

रमेश ने अपने पत्र में कहा कि कानून के अनुसार अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में बंदरगाह परियोजनाओं के लिए व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन अध्ययन अनिवार्य है। उन्होंने तर्क दिया कि ग्रेट निकोबार की जैव विविधता और पारिस्थितिकी अत्यंत संवेदनशील तथा विशिष्ट है, इसलिए यहां कम से कम तीन मौसमों पर आधारित आधारभूत अध्ययन आवश्यक था, ताकि मौसमी बदलावों और पर्यावरणीय प्रभावों का सही तरीके से मूल्यांकन किया जा सके।

 

जयराम रमेश ने पर्यावरण मंत्रालय के 03 नवंबर 2009 के कार्यालय ज्ञापन का उल्लेख करते हुए कहा कि अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में 50 लाख टन प्रतिवर्ष से अधिक क्षमता वाली बंदरगाह परियोजनाओं के लिए व्यापक ईआईए, भौतिक एवं गणितीय मॉडलिंग तथा जमीनी सत्यापन अनिवार्य है।

 

रमेश के अनुसार इतने बड़े स्तर की परियोजना के लिए केवल सीमित अवधि के अध्ययन के आधार पर मंजूरी देना पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी है।

 

कांग्रेस नेता ने कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की 2021 की मैपिंग में गैलाथिया खाड़ी के बड़े हिस्से को कटावग्रस्त तटीय क्षेत्र के रूप में चिह्नित किया गया था। ऐसे संवेदनशील क्षेत्रों में विस्तृत और दीर्घकालिक पर्यावरणीय अध्ययन की आवश्यकता होती है। उन्होंने पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के 2015 के लोकसभा वक्तव्य का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि केवल एक मौसम के आंकड़ों पर आधारित त्वरित ईआईए पर्यावरणीय चिंताओं का पर्याप्त समाधान नहीं कर सकता।

 

रमेश ने आरोप लगाया कि परियोजना के लिए तैयार अंतिम ईआईए रिपोर्ट मार्च 2022 में प्रस्तुत की गई थी, लेकिन उसमें स्वयं स्वीकार किया गया है कि पर्यावरणीय आधारभूत अध्ययन केवल दिसंबर 2020 से फरवरी 2021 के बीच एक ही मौसम में किया गया। उनके अनुसार यह अध्ययन वैज्ञानिक मानकों और दीर्घकालिक पर्यावरणीय मूल्यांकन की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता।

 

रिपोर्ट के हवाले से उन्होंने कहा कि जैव विविधता का प्राथमिक सर्वेक्षण केवल 14 से 22 दिसंबर 2020 के बीच किया गया, जबकि लेदरबैक कछुओं का अध्ययन 12 से 18 फरवरी 2021 तक सीमित रहा। उनका कहना है कि इतनी कम अवधि के अध्ययन से किसी क्षेत्र की वास्तविक पारिस्थितिक स्थिति और जैव विविधता का समुचित आकलन संभव नहीं है।

 

उन्होंने यह भी कहा कि ईआईए रिपोर्ट में स्वीकार किया गया है कि घने और अभेद्य जंगलों के कारण सर्वेक्षण सीमित स्तर तक ही संभव हो पाया। रिपोर्ट में यह टिप्पणी भी दर्ज है कि अब तक जो जानकारी सामने आई है वह पूर्ण नहीं है और जो अब भी अज्ञात है, वह संभवतः अधिक महत्वपूर्ण और मूल्यवान हो सकता है। रमेश के अनुसार यह टिप्पणी स्वयं इस बात का संकेत है कि अध्ययन अधूरा था।

 

कांग्रेस महासचिव ने कहा कि भारतीय प्राणी सर्वेक्षण की रिपोर्ट फरवरी-मार्च 2021 के आंकड़ों पर आधारित थी, जबकि भारतीय वन्यजीव संस्थान की रिपोर्ट ने स्वयं को ‘रैपिड असेसमेंट स्टडी’ बताया है, जो अप्रैल 2021 में कुछ दिनों के दौरे पर आधारित थी। इसके अलावा परियोजना प्रस्तावक एएनआईआईडीसीओ के आवेदन पत्र में भी ईआईए अध्ययन की अवधि कुछ दिनों और सप्ताहों तक सीमित बताई गई है।

 

रमेश ने आरोप लगाया कि जिन अध्ययनों के आधार पर पर्यावरणीय मंजूरी दी गई, वे न तो व्यापक पर्यावरण प्रभाव आकलन हैं और न ही पर्याप्त आधारभूत आंकड़ों पर आधारित वैज्ञानिक अध्ययन। उन्होंने कहा कि इस प्रकार की रिपोर्टें विज्ञान और ईआईए प्रक्रिया दोनों का मजाक बनाती हैं।

 

कांग्रेस नेता ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के 03 अप्रैल 2023 के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि अधिकरण ने पर्यावरणीय मंजूरी में “अनुत्तरित कमियों” की बात कही थी और मामले की पुनर्समीक्षा के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया था।

 

रमेश ने आरोप लगाया कि पर्यावरण मंत्रालय ने समिति की रिपोर्ट को गोपनीय रखा है, जबकि यह सार्वजनिक महत्व और पर्यावरणीय हितों से जुड़ा विषय है।

 

जयराम रमेश ने अपने पत्र में कहा कि ग्रेट निकोबार की जैव विविधता वैश्विक स्तर पर अत्यंत विशिष्ट और दुर्लभ है। यहां लगातार नई वनस्पति और जीव प्रजातियों की खोज हो रही है। उनका कहना है कि परियोजना के वर्तमान स्वरूप से इस अनूठे पारिस्थितिक तंत्र को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। उन्होंने प्रतिपूरक वनीकरण के तर्क को भी अव्यावहारिक बताते हुए कहा कि सदियों पुराने प्राकृतिक वनों की भरपाई कृत्रिम वृक्षारोपण से नहीं की जा सकती।

 

उन्होंने यह भी कहा कि कई सुरक्षा विशेषज्ञ पहले ही लिख चुके हैं कि देश की सामरिक और सुरक्षा आवश्यकताओं को पर्यावरणीय विनाश के बिना भी पूरा किया जा सकता है। अंत में रमेश ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री से परियोजना की वर्तमान रूपरेखा, पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रिया और उससे जुड़े सभी अध्ययनों की पुनर्समीक्षा कराने का आग्रह किया है।

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