नई दिल्ली : संसद के आगामी मॉनसून सत्र से पहले देश की सियासत में एक बार फिर संविधान संशोधन विधेयक को लेकर हलचल तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, सरकार महिला आरक्षण कानून को पूरी तरह से लागू करने की दिशा में एक बड़े मास्टरप्लान पर काम कर रही है। चर्चा है कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक किया जा सकता है। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य न केवल महिला प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करना है, बल्कि परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की आपत्तियों को भी शांत करना है।
सीटें बढ़ाने का नया गणित और ‘प्रस्तावित फॉर्मूला’
सरकार जिस नए फॉर्मूले पर विचार कर रही है, उसके तहत सभी राज्यों में लोकसभा सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत तक की वृद्धि का प्रस्ताव है। सबसे अहम बात यह है कि इसमें 1971 की जनगणना के आधार पर राज्यों के बीच सीटों का मौजूदा अनुपात बरकरार रखा जाएगा, जबकि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सीटों का पुनर्निर्धारण होगा। इस कवायद का अंतिम लक्ष्य 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले महिला आरक्षण कानून को जमीनी स्तर पर लागू करना है।
संसद में बहुमत का ‘अग्निपरीक्षा’
संविधान संशोधन के लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की अनिवार्यता होती है। लोकसभा में मौजूदा स्थिति पर नजर डालें तो प्रभावी सदस्य संख्या 540 है, जिसके लिए दो-तिहाई बहुमत यानी 360 का आंकड़ा चाहिए। वर्तमान में एनडीए के पास 319 सांसदों का समर्थन है, जिसमें हाल ही में शामिल हुए कुछ बागी सांसद भी शामिल हैं। हालांकि, यह संख्या अपेक्षित आंकड़े से अभी भी पीछे है। माना जा रहा है कि यदि विपक्ष के कुछ दल मतदान से दूरी बनाते हैं, तो यह जादुई आंकड़ा घटकर 342 तक आ सकता है, जो सरकार के लिए राहत की बात हो सकती है।
राज्यसभा का समीकरण
उच्च सदन यानी राज्यसभा में एनडीए की स्थिति थोड़ी मजबूत जरूर है, लेकिन वहां भी बहुमत का रास्ता आसान नहीं है। राज्यसभा की 242 सीटों में से दो-तिहाई बहुमत यानी 164 सीटों की आवश्यकता है। वर्तमान में भाजपा के पास 114 सीटें हैं। शेष सीटें कांग्रेस, तृणमूल, द्रमुक और अन्य क्षेत्रीय दलों के पास हैं। इन आंकड़ों को देखते हुए आगामी सत्र में सरकार को विधेयक पारित कराने के लिए विपक्षी दलों या अन्य क्षेत्रीय ताकतों के साथ गहन राजनीतिक तालमेल बिठाना होगा।
अध्यक्ष के फैसलों पर टिकी निगाहें
संसद के इस महत्वपूर्ण सत्र से पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की भूमिका भी बेहद अहम होने वाली है। सदन में तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (यूबीटी) के बागी सांसदों को लेकर कई कानूनी और प्रक्रियात्मक निर्णय होने हैं। वहीं, द्रमुक ने भी सदन में बैठने की व्यवस्था में बदलाव का अनुरोध किया है, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि मॉनसून सत्र में सरकार इस बड़े संवैधानिक बदलाव का विधेयक पेश करती है या नहीं।
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