मदरसों का उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड में पंजीकरण अनिवार्य किए जाने के विरुद्ध मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड जाएगा सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली : उत्तराखंड सरकार के जरिए उत्तराखंड में चल रहे सभी मदरसो़ंं का उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड में पंजीकरण अनिवार्य किए जाने के फैसले का ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कड़े शब्दों शब्दों में निंदा की है।

 

इस सिलसिले में बोर्ड के जरिए जारी किए गए संयुक्त वक्तव्य में बोर्ड के अध्यक्ष खालिद सैफुल्लाह रहमानी सहित जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी, जमात-ए-इस्लामी हिंद के अध्यक्ष सैयद सआदतउल्लाह हुसैनी, जमीअत अहले हदीस के अमीर असगर अली इमाम सल्फी मेहंदी, जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी, पूर्व सांसद मौलाना ओबैदुल्ला खान आजमी सहित बोर्ड के अन्य पदाधिकारी ने भी हस्ताक्षर किए हैं।

 

इस संयुक्त बयान में कहा गया है कि इस फैसले के खिलाफ मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहा है।

 

संयुक्त बयान में इस फैसले को संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन बताते हुए कहा गया है कि जब संविधान ने सभी अल्पसंख्यक समुदायों को अपने शिक्षण संस्थान स्थापित करने और चलाने की अनुमति प्रदान की है तो ऐसे में उत्तराखंड सरकार संविधान के मूल भावनाओं के विरूद्ध जाकर मदरसों को सरकार के शिक्षण बोर्ड के तहत लाने और उनका पंजीकरण कराने की बात कैसे कर सकती है। संयुक्त बयान में कहा गया है कि मदरसों के खिलाफ उत्तराखंड सरकार की यह गहरी साजिश है जिसे कामियाब नहीं होने दिया जाएगा।

 

उन्होंने कहा कि मदरसों में इस्लामी शिक्षा दी जाती है और कोई भी सरकार मदरसों में क्या शिक्षा दी जानी चाहिए, क्या नहीं दी जानी चाहिए, इसको लेकर दिशा-निर्देश नहीं जारी कर सकती और ना ही यह तय कर सकती है कि मदरसों में क्या पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा और किस तरह की धार्मिक शिक्षा दी जाएगी। संयुक्त बयान में कहा गया है कि मदरसे हमेशा से स्वतंत्र रूप से शिक्षा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं और मदरसों की देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और मदरसे हमेशा समाज के उत्थान और विकास के लिए भी प्रत्याशील रहे हैं। इसलिए उनके ऊपर अंकुश लगाना ठीक नहीं है। संयुक्त बयान में सरकार से अपने फैसले को वापस लिए जाने की मांग की गई है और कहा गया है कि मदरसों को राज्य शिक्षा बोर्ड में पंजीकरण कराने के अनिवार्यता को खत्म किया जाना चाहिए और मदरसों को पूरी तरह से स्वतंत्र रहने दिया जाना चाहिए।

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