दूध, आम और खुबानी के जरिए जलवायु परिवर्तन की कहानी, सीईईडब्ल्यू की ‘सस्टेना इंडिया’ कला प्रदर्शनी की शुरुआत

नई दिल्ली : विज्ञान और कला के जरिए जलवायु परिवर्तन पर सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देने के उद्देश्य के साथ सस्टेना इंडिया कला प्रदर्शनी अपने तीसरे संस्करण के साथ लौट आई है। शनिवार को सस्टेना इंडिया की प्रदर्शनी की शुरुआत हुई। 15 फरवरी तक बीकानेर हाउस, नई दिल्ली में चलने वाली यह प्रदर्शनी क्लाइमेट थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू ) और प्रसिद्ध कलाकारों ठुकराल व टागरा का साझा प्रयास है।

 

इस बार की प्रदर्शनी का शीर्षक “बिटर नेक्टर” है, जिसमें फल के विभिन्न चक्रों, खाद्य प्रणालियों और मौसम आधारित प्रचुरता की निगाह के साथ जलवायु परिवर्तन की पड़ताल की गई है।

 

इस वर्ष सस्टेना इंडिया का मुख्य विषय “बिटर नेक्टर” है, जो भोजन, स्वाद, श्रम और मौसमी प्रचुरता जैसी रोजमर्रा की चीजों को देखने के हमारे तरीके में बदलाव लाता है।

 

इसमें तीन सस्टेना इंडिया फेलो को शामिल किया गया है, जिनके कार्य विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और खाद्य सामग्रियों पर आधारित हैं।

 

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर निवासी वेदांत पाटिल एक फिल्म निर्माता और पीएचडी के छात्र हैं। वे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में दूध के नाजुक सफर पर निगाह रखते हैं। उनका काम दूध के पीछे के अदृश्य श्रम, बुनियादी ढांचे और पारिस्थितिकीय दबावों को सामने लाता है, जो दैनिक खपत के लिए इसकी आपूर्ति बनाए रखता है।

 

लद्दाख की रहने वाली अनुजा दासगुप्ता एक कलाकार और कृषि उद्यमी हैं। वे अधिक ऊंचाई पर रहने वाले समुदायों की एक-दूसरे पर निर्भरता, उनके मौसमी ज्ञान और जलवायु के प्रति सुभेद्यताओं की पड़ताल करती हैं। वे इसके लिए खुबानी का इस्तेमाल करती हैं, जो इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

 

गुजरात के रहने वाले मृगेन राठौड़ एक दृश्य कलाकार और शिक्षक हैं। वे गिर क्षेत्र के साथ बेहद गहराई से जुड़ी एक मूर्तिकला के जरिए आम के मोनोकल्चर, वन-पारिस्थितिकी तंत्रों और मानवों व पशुओं के विस्थापन की पड़ताल करते हैं।

 

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश से पूरे देश में खाद्य तंत्र में चुपचाप लेकिन प्रभावकारी बदलाव आ रहे हैं।

 

सस्टेना इंडिया के तीसरे संस्करण के दौरान विभिन्न तरह के चर्चा सत्रों, कार्यशालाओं, प्रदर्शनों और संवादात्मक गतिविधियों को शामिल किया गया है। सप्ताहांत में 15 से अधिक साझेदारों के साथ मिलकर बातचीत, वर्कशॉप, थिएटर और सीखने वाले अनुभवों के जीवंत कार्यक्रम शामिल किए गए हैं। इसमें श्रयाना भट्टाचार्य (लेखक और अर्थशास्त्री), अनिरुद्ध कनिसेट्टी (लेखक और इतिहासकार), प्रज्ञा कपूर (अभिनेत्री और फिल्म निर्माता), थॉमस जकारियास (शेफ), शुभ्रा चटर्जी (लेखक और निर्देशक), अनुपमा मंडलोई (इम्पैक्ट प्रोड्यूसर), और केविन केनेथ ली (मीडिया लीडर) जैसे कई वक्ता शामिल होंगे। इसमें ज़ीन-मेकिंग, अपसाइक्लिंग, मटेरियल लिटरेसी, डेटा स्टोरीटेलिंग और जलवायु केंद्रित लेखन जैसे कार्यों को भी सीखने का अवसर होगा।

 

सीईईडब्ल्यू के डायरेक्टर ऑफ स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस, मिहिर शाह ने मीडिया को बताया कि भू-राजनीतिक उथल-पुथल और नए सिरे से बन रही वैश्विक व्यवस्था के बीच, जलवायु परिवर्तन का जोखिम बरकरार है। 2025 रिकॉर्ड में तीसरा सर्वाधिक गर्म वर्ष के रूप में दर्ज किया गया। भारत आज जो भी उगाता है, जिसका सेवन करता है, और जिस पर निर्भर करता है, वे सभी जलवायु परिवर्तन से पहले से प्रभावित हैं। सस्टेना इंडिया का तीसरा संस्करण जलवायु से जुड़ी चर्चाओं को वास्तविक जीवन के अनुभवों के साथ जोड़ती है। यह दिखाता है कि कैसे खाद्य प्रणालियां और मौसम के साथ उसके तालमेल में आने वाली बाधाएं सीधे तौर पर समुदायों और आजीविकाओं को प्रभावित करती हैं। प्रभावी जलवायु कार्रवाइयों को इन वास्तविकताओं और इनमें छिपे ज्ञान को निश्चित तौर पर शामिल करना चाहिए, क्योंकि हमें और अधिक जलवायु समाधानों की तलाश है।”

 

सस्टेना इंडिया ने तीन फेलो के साथ जलवायु परिवर्तन के विभिन्न दृष्टिकोणों को दिखाने वाले दूसरे कलाकारों को भी शामिल किया है ।

 

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