नागपुर : राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने बुधवार को नागपुर स्थित राष्ट्रीय प्रत्यक्ष कर अकादमी (एनएडीटी) में भारतीय राजस्व सेवा (आईआरएस) के प्रशिक्षुओं को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्होंने आह्वान किया कि ईमानदारी और पारदर्शिता को सर्वोपरि मान कर ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य की ओर तेज़ी से बढ़ें।
इस अवसर पर राष्ट्रपति ने कहा कि एनएडीटी एक अत्यंत प्रतिष्ठित प्रशिक्षण संस्थान है, जिसने दशकों से ऐसे अधिकारियों को तैयार किया है, जिन्होंने देश की प्रत्यक्ष कर प्रशासन व्यवस्था को सुदृढ़ किया है। यहां प्राप्त प्रशिक्षण केवल कानूनों और प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है बल्कि यह लोकसेवा की भावना, नैतिक मूल्यों और जिम्मेदारी की गहरी समझ विकसित करता है। देश की आर्थिक प्रगति का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि प्रत्यक्ष कर संग्रह में निरंतर वृद्धि, कर अनुपालन में सुधार और कर आधार का विस्तार नागरिकों तथा प्रशासन के बीच बढ़ते विश्वास का प्रतीक है। इस गति को बनाए रखने के लिए शासन व्यवस्था में दक्षता, पारदर्शिता और समावेशिता अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में प्राचीन भारतीय विचारक कौटिल्य के कर सिद्धांत का उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि कर संग्रह ऐसा होना चाहिए जो प्रजा पर अनावश्यक बोझ न डाले, जैसे मधुमक्खी फूलों को क्षति पहुंचाए बिना मधु एकत्र करती है। यह विचार इस बात को स्पष्ट करता है कि कराधान केवल राजस्व का साधन नहीं बल्कि राज्य और नागरिकों के बीच विश्वास का सेतु है। बीते एक अप्रैल 2026 से लागू आयकर अधिनियम 2025 को एक ऐतिहासिक सुधार बताते हुए उन्होंने कहा कि यह आधुनिक, सरल और पारदर्शी कर व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा कि इस सुधार की सफलता इसके निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी, जिसकी जिम्मेदारी नवप्रशिक्षित अधिकारियों पर होगी।
उन्होंने कहा कि भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी केवल कर संग्रहकर्ता नहीं हैं बल्कि वे जन-विश्वास, न्याय और निष्पक्षता के संरक्षक भी हैं। प्रशासन में तकनीक आधारित प्रणालियों, जैसे डेटा एनालिटिक्स और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), के उपयोग से पारदर्शिता और दक्षता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय कराधान के क्षेत्र में भारत की बढ़ती भागीदारी का उल्लेख करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि द्विपक्षीय और बहुपक्षीय समझौतों के माध्यम से वैश्विक कर प्रणाली को अधिक सरल और प्रभावी बनाया जा रहा है, जिससे भारत में व्यापार करना और अधिक सुगम हुआ है।
युवा अधिकारियों को सलाह देते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि वे अपने कार्य व्यवहार में विनम्रता, संयम और संवेदनशीलता को अपनाएं। उन्हें यह स्मरण रखना चाहिए कि उनके प्रत्येक निर्णय और मूल्यांकन का प्रभाव राष्ट्र के विकास और सामाजिक न्याय पर पड़ता है। स्वैच्छिक अनुपालन को बढ़ावा देने के लिए करदाताओं का विश्वास अत्यंत आवश्यक है।
राष्ट्रपति ने अंत में कहा कि ‘अमृत काल’ अवसरों और उत्तरदायित्वों का काल है, जिसमें प्रत्येक अधिकारी को ईमानदारी, निष्पक्षता और राष्ट्रसेवा को अपना सर्वोच्च उद्देश्य बनाना चाहिए।
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